TMC में ऐतिहासिक बगावत: ममता बनर्जी को झटका, 58 विधायकों ने ऋतब्रत बनर्जी को चुना नेता!

तृणमूल कांग्रेस बगावत पश्चिम बंगाल

West Bengal Politics: पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद TMC में ऐतिहासिक बगावत। 80 में से 58 विधायकों ने अभिषेक बनर्जी के खिलाफ खोला मोर्चा। जानें क्या है पूरा ‘साइनगेट’ विवाद।

पश्चिम बंगाल के सियासी गलियारों से इस वक्त एक ऐसी सनसनीखेज खबर सामने आ रही है जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। राजनीति में हार के बाद अंदरूनी कलह होना आम बात है, लेकिन तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 28 साल के इतिहास में कभी ऐसा ऐतिहासिक भूचाल नहीं आया।

ममता बनर्जी, जिनका पश्चिम बंगाल की सड़कों से लेकर सचिवालय तक एकछत्र राज था, आज बेहद असहज नज़र आ रही हैं। उनकी अपनी ही पार्टी का दो-तिहाई से ज्यादा हिस्सा (80 में से 58 विधायक) बागी हो चुका है। इस अभूतपूर्व टूट का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं पूर्व राज्यसभा सांसद और विधायक ऋतब्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee), जिन्हें अब विधानसभा में नया नेता प्रतिपक्ष (LoP) भी मान लिया गया है।

लेकिन इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा और दिलचस्प मोड़ यह है कि यह बगावत ममता बनर्जी के खिलाफ नहीं है। बागी गुट खुलेआम कह रहा है कि “दीदी हमारी नेता और मार्गदर्शक हैं, लेकिन उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी की मनमानी और फैसले हमें कतई मंजूर नहीं।”

⚡ क्रोनोलॉजी: चुनाव नतीजों से लेकर खुली बगावत तक का सफर

TMC के इस बड़े विभाजन की पटकथा अचानक नहीं लिखी गई, बल्कि इसकी नींव हालिया विधानसभा चुनावों के नतीजों के साथ ही पड़ गई थी:

  • 4 मई (करारी शिकस्त और सत्ता परिवर्तन): 294 सीटों वाली बंगाल विधानसभा के चुनावी नतीजे सामने आए। भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई और सत्ताधारी TMC महज 80 सीटों के साथ विपक्ष की बेंच पर सिमट गई।
  • 6 मई (असंतोष का पहला विस्फोट): चुनाव में मिली हार की समीक्षा के लिए ममता बनर्जी ने पार्टी नेताओं की बैठक बुलाई। बैठक में उन्होंने हार के बावजूद अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के चुनावी काम की जमकर तारीफ की। बस यहीं से पुराने और वरिष्ठ नेताओं का सब्र टूट गया। ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साह ने खुलेआम अभिषेक के बेहद करीबी जहांगीर खान का मुद्दा उठा दिया, जिन्होंने ऐन वक्त पर फाल्टा सीट से अपना नाम वापस लेकर बीजेपी की राह आसान कर दी थी।
  • 20 मई (द ‘साइनगेट’ स्कैंडल): विधानसभा में विपक्ष का नेता चुनने के लिए TMC की तरफ से सोबनदेव चट्टोपाध्याय का नाम आगे बढ़ाया गया। अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा सचिवालय को एक प्रस्ताव सौंपा और दावा किया कि उनके पास पार्टी के 70 विधायकों के दस्तखत वाला समर्थन पत्र है।
  • 26 मई (फर्जीवाड़े का पर्दाफाश और CID जांच): खेल तब पूरी तरह पलट गया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साह सीधे विधानसभा स्पीकर के पास पहुंच गए। उन्होंने आरोप लगाया कि अभिषेक बनर्जी ने जो लिस्ट सौंपी है, उस पर कई विधायकों के फर्जी साइन (Forgery) किए गए हैं! मामला इतना गंभीर था कि सरकारी दस्तावेज में जालसाजी की जांच राज्य की सीआईडी (CID) को सौंप दी गई।
  • 11 जून (ममता बनर्जी को लगा सबसे बड़ा झटका): डैमेज कंट्रोल और ताकत दिखाने के लिए ममता बनर्जी ने अपने सभी 80 विधायकों की एक आपात बैठक बुलाई। मगर चौंकाने वाली बात यह रही कि वहां सिर्फ 20 विधायक ही पहुंचे! बाकी के 58 से 60 विधायक कोलकाता के अलग-अलग होटलों में बागी गुट के साथ नई रणनीति बनाने में व्यस्त थे। बौखलाहट में पार्टी ने ऋतब्रत और संदीपन को निष्कासित कर दिया।
  • 3 जून (आधिकारिक तौर पर बंटी TMC): पार्टी का निष्कासन पूरी तरह बेअसर रहा। बागी गुट के 58 विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष (Speaker) के सामने बकायदा परेड की और ऋतब्रत बनर्जी को अपना सर्वसम्मत नेता चुन लिया। संख्या बल को देखते हुए स्पीकर ने ऋतब्रत बनर्जी को आधिकारिक तौर पर विपक्ष का नेता (Leader of Opposition) घोषित कर दिया।

🧐 TMC की यह टूट महाराष्ट्र के सियासी संकट से अलग कैसे है?

यह बगावत शिवसेना या NCP (राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी) में हुई टूट जैसी बिल्कुल नहीं है। बागी गुट ने बेहद शातिर और कानूनी रूप से मजबूत राजनीतिक चाल चली है:

1. “दीदी आप हमारी मार्गदर्शक बनी रहिए”

महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे या अजीत पवार ने अपने पुराने कप्तानों (उद्धव ठाकरे और शरद पवार) को पूरी तरह दरकिनार कर दिया था। लेकिन यहाँ, ऋतब्रत बनर्जी ने कमान संभालते ही बड़ा बयान दिया: “हम आज भी TMC ही हैं और पार्टी में ही रहेंगे। हम ममता बनर्जी से अपील करते हैं कि वे हमारी मुख्य सलाहकार (Main Advisor) की भूमिका में आएं।” बागी नेता अच्छी तरह जानते हैं कि बंगाल की जनता के बीच ममता बनर्जी का चेहरा अब भी लोकप्रिय है, इसलिए वे दीदी को ढाल बनाकर सीधे अभिषेक बनर्जी के ‘उत्तराधिकार’ पर चोट कर रहे हैं।

2. एंटी-डिफेक्शन लॉ का अभेद्य कवच

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के मुताबिक, किसी भी पार्टी के विधायकों को दलबदल कानून के तहत अपनी सदस्यता बचाने के लिए कम से कम दो-तिहाई (2/3 बहुमत) विधायकों का साथ चाहिए होता है। विपक्ष में बैठी TMC के पास कुल 80 विधायक हैं, जिसका दो-तिहाई आंकड़ा 54 होता है। बागी गुट के पास इस समय 58 विधायकों का खुला समर्थन है। यानी कानूनी तौर पर उनकी विधायकी पूरी तरह सुरक्षित है और वही इस वक्त विधानसभा में “असली” तृणमूल बन चुके हैं।

3. दिल्ली तक अभिषेक बनर्जी की घेराबंदी

यह विवाद सिर्फ बंगाल विधानसभा तक सीमित नहीं रहने वाला है। ऋतब्रत बनर्जी ने अब सीधे दिल्ली (लोकसभा) में भी मोर्चा खोल दिया है। उनका तर्क है कि चूंकि अभिषेक बनर्जी ने विधानसभा सचिवालय में एक फर्जी हस्ताक्षरित दस्तावेज पेश किया है जो कि एक गंभीर आपराधिक श्रेणी में आता है, इसलिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर उनकी संसद सदस्यता भी तुरंत रद्द की जानी चाहिए।

📊 तेज़ख़बर (TezKhabar) विश्लेषण: क्या यह ‘भतीजावाद’ पर भारी पड़ा जनआक्रोश है?

TMC का यह अप्रत्याशित बिखराव भारतीय राजनीति के एक कड़वे और शाश्वत सच को दोबारा रेखांकित करता है—“सत्ता जाते ही वफादारियां बदल जाती हैं।” जब तक ममता बनर्जी के पास सत्ता की चाबी थी, तब तक पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता अभिषेक बनर्जी के फैसलों और उनके एकछत्र नेतृत्व को चुपचाप स्वीकार कर रहे थे। लेकिन जैसे ही पार्टी चुनाव हारी, सालों से दबा हुआ गुस्सा “परिवारवाद” (Nepotism) के खिलाफ एक ज्वालामुखी बनकर फूट पड़ा।

अब देखना यह होगा कि क्या सड़कों पर उतरकर जनआंदोलन खड़ा करने वाली ममता बनर्जी अपनी पार्टी के इस सबसे बड़े बिखराव को संभाल पाती हैं, या यह पश्चिम बंगाल में उनके राजनीतिक युग के ढलान की शुरुआत है।

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