मंत्री दीपिका पांडे सिंह के “लाठीचार्ज नहीं होगा” बयान के कुछ ही देर बाद झारखंड पुलिस ने JPSC-JSSC छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। जानें 2003 से चले आ रहे पेपर लीक विवाद की पूरी टाइमलाइन, पूर्व मुख्य सचिव तक पहुंची जांच, और आज की पूरी अपडेट
रांची। झारखंड में JPSC-JSSC परीक्षा विवाद को लेकर चल रहा आंदोलन सोमवार दोपहर उस वक्त हिंसक मोड़ पर पहुंच गया, जब पुलिस ने प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह कार्रवाई राज्य सरकार की मंत्री दीपिका पांडे सिंह के उस सार्वजनिक बयान के कुछ ही देर बाद हुई, जिसमें उन्होंने भरोसा दिलाया था कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पैलेट गन, आंसू गैस या लाठीचार्ज का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा।
बैरिकेड पर चढ़े छात्र, दोबारा चला वाटर कैनन
छात्रों को पुलिस बैरिकेड पर चढ़ते देख सुरक्षाबलों ने एक बार फिर वाटर कैनन का इस्तेमाल किया और इसके तुरंत बाद लाठीचार्ज की कार्रवाई शुरू कर दी। इससे पहले सुबह प्रदर्शनकारियों ने पुरानी विधानसभा के पास छह पुलिस बैरिकेड तोड़कर नई विधानसभा भवन की ओर कूच किया था, जिसके बाद मौके पर पहले से ही भारी तनाव था।
अनुशासित मार्च की तैयारी, फिर भी बिगड़े हालात
गौरतलब है कि मार्च शुरू होने से पहले “JPSC JSSC Reform Manch” से जुड़े छात्र सफेद “VOLUNTEER” टी-शर्ट पहनकर जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम में जमा हुए थे। आयोजकों ने मेगाफोन के जरिए भीड़ प्रबंधन किया और स्वयंसेवकों को सख्त अनुशासन बनाए रखने, सुरक्षाबलों से समन्वय करने और किसी भी तोड़फोड़ की कोशिश को तुरंत रोकने के निर्देश दिए थे। छात्र नेता रविंद्र पासवान ने मीडिया के सामने दोहराया था कि झारखंड भर से जुटे छात्र और युवा पूरी तरह शांतिपूर्ण और संवैधानिक तरीके से मार्च करेंगे। इसके बावजूद पुलिस की सख्ती और बैरिकेड टूटने के बाद स्थिति तनावपूर्ण हो गई।
प्रशासन ने विधानसभा घेराव के मद्देनज़र विधानसभा के 750 मीटर के दायरे में — हाईकोर्ट क्षेत्र को छोड़कर — पहले से ही BNS की धारा 163 लागू कर रखी थी, और जगन्नाथ मंदिर वाले रूट पर रेजर-वायर फेंसिंग व भारी बैरिकेडिंग की गई थी।
सरकार ने पहले ही मानी थीं ज्यादातर मांगें, फिर भी क्यों भड़का आंदोलन?
लाठीचार्ज से एक दिन पहले, रविवार को राज्य सरकार और छात्र प्रतिनिधियों के बीच तीन दिन तक चली गहन बातचीत के बाद मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू ने ऐलान किया था कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के निर्देश पर सरकार ने छात्रों की लगभग सभी मांगें मान ली हैं — जिनमें 14वीं JPSC परीक्षा और 2023-25 की बैकलॉग भर्ती परीक्षाएं रद्द करना शामिल है। इसके साथ ही तीन JPSC सदस्यों — अजिता भट्टाचार्य, अनिमा हांसदा और जमाल अहमद — के इस्तीफे भी राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने मंजूर कर लिए थे, और भर्ती अनियमितताओं की जांच के लिए CID व ED जांच का ऐलान किया गया था।
लेकिन छात्र इससे संतुष्ट नहीं हुए। छात्र नेता कुणाल ने साफ कहा था कि उनकी एकमात्र मांग CBI जांच है और इस पर कोई समझौता नहीं होगा। प्रदर्शनकारी अनीश फातिमा ने JPSC सदस्यों के इस्तीफे पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह डर से उठाया गया कदम है, और CID जांच में सिर्फ “छोटी मछलियां” बेनकाब हो रही हैं जबकि असली जवाबदेही के लिए CBI जांच जरूरी है, ताकि “बड़ी मछलियां” भी पकड़ में आएं। एक अन्य प्रदर्शनकारी अर्चना कुमारी ने कहा था कि सिर्फ इस्तीफों से प्रभावित उम्मीदवारों की मांगें पूरी नहीं होतीं।
सरकार ने CBI जांच की मांग के बदले एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में न्यायिक जांच कराने और वित्तीय गड़बड़ी पाए जाने पर ED को भी शामिल करने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन छात्र इस पर राजी नहीं हुए और आंदोलन जारी रखने का फैसला लिया।
सिर्फ आज की बात नहीं — दो दशक पुराना है JPSC-JSSC का पेपर लीक चक्र
आज के लाठीचार्ज को सही संदर्भ में समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि झारखंड में भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी का यह सिलसिला नया नहीं, बल्कि राज्य गठन के शुरुआती वर्षों से चला आ रहा है। पहला बड़ा विवाद 2003 में सामने आया था, जब इतिहास के पेपर के लीक होने के आरोपों के बाद JPSC को अगस्त 2003 में हुई परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी और उसे 2004 में दोबारा आयोजित किया गया। उसके बाद से लगभग हर कुछ वर्षों में यह विवाद किसी न किसी रूप में लौटता रहा है।
छात्रों का आरोप है कि पेपर लीक, आंसर-की को लेकर विवाद, परिणामों पर आपत्ति और चयन प्रक्रिया में गड़बड़ी जैसी शिकायतें परीक्षाओं के अलग-अलग चरणों में सामने आती रही हैं, और यह सिलसिला 2021 से लगातार जारी है — जब JPSC की संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा में आंसर-की और चयन प्रक्रिया को लेकर शिकायतें उठी थीं। 2022 में कई JSSC परीक्षाओं में आंसर-की, कट-ऑफ और मूल्यांकन पद्धति को लेकर प्रदर्शन हुए, जबकि 2023 में JSSC-CGL परीक्षा एक बड़ा मोड़ बनकर उभरी, जब परीक्षा से पहले ही पेपर लीक के आरोप लगे और सवाल पत्र सोशल मीडिया पर प्रसारित होने के दावों ने जांच की मांग को जन्म दिया। 2024 में JGGLCCE (JSSC CGL) परीक्षा में पेपर लीक, संगठित नकल और डमी अभ्यर्थियों के इस्तेमाल के आरोप लगे, जिस पर विपक्षी दलों ने भी CBI जांच की मांग उठाई थी, और 2025 में भी अन्य JSSC भर्ती परीक्षाओं के चयन और परिणाम को लेकर छात्रों का प्रदर्शन जारी रहा।
यही वजह है कि छात्र अब सिर्फ मौजूदा JSSC-CGL मामले तक सीमित नहीं हैं। उनकी मांग है कि 2019 से अब तक JPSC और JSSC द्वारा आयोजित सभी विवादित भर्ती परीक्षाओं की CBI जांच हो, ताकि जिम्मेदार लोगों की पहचान हो सके और युवा नौकरी उम्मीदवारों का भरोसा बहाल हो सके।
जांच में अब तक क्या खुला — पूर्व चीफ सेक्रेटरी तक पहुंची आंच
मौजूदा विवाद में जांच की परतें लगातार खुलती जा रही हैं। बढ़ते विरोध और आक्रोश के बीच हेमंत सोरेन सरकार ने पेपर लीक के आरोपों पर CID जांच के आदेश दिए थे, जिसके तहत CID ने 22 जुलाई को भारतीय न्याय संहिता 2023 के तहत आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, मूल्यवान दस्तावेज की जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसी धाराओं में मामला दर्ज किया। इसी दिन राज्य एजेंसी ने JPSC की डिप्टी कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन श्वेता कुमारी गुप्ता को और परीक्षा संचालन की जिम्मेदार निजी कंपनी TSR डेटा प्रोसेसिंग प्राइवेट लिमिटेड (TDPL) के निदेशकों रामवीर सिंह व अभय कुमार तिवारी को गिरफ्तार किया।
जांच की सबसे चौंकाने वाली कड़ी तब सामने आई जब इसका दायरा आयोग के शीर्ष स्तर तक पहुंच गया। TDPL के पुराने इतिहास की जांच के बाद निशाना JPSC के तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांगते पर केंद्रित हो गया, जो इससे पहले सोरेन सरकार में दिसंबर 2023 से अक्टूबर 2024 तक राज्य के मुख्य सचिव रह चुके थे। खियांगते से राज्य एजेंसी ने चार बार पूछताछ की और रांची स्थित उनके आवास व कार्यालय परिसरों पर छापेमारी भी हुई, जिसके बाद उन्होंने JPSC अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। यानी विवाद अब सिर्फ निचले स्तर के कर्मचारियों तक सीमित नहीं, बल्कि राज्य प्रशासन के सबसे वरिष्ठ पदों तक पहुंच चुका है — जो छात्रों की CID जांच पर अविश्वास और CBI जांच की जिद को और मजबूत आधार देता है।
गौर करने वाली बात यह भी है कि आरोपी अभय तिवारी की पृष्ठभूमि खुद कई सवाल खड़े करती है — वह पहले राज्य ब्लॉक सप्लाई परीक्षा में टॉपर रह चुका है, कई प्रतियोगी परीक्षाएं पास कर चुका है, और इसी साल आयोजित JPSC प्रारंभिक परीक्षा भी उत्तीर्ण कर चुका था, जबकि परीक्षा संचालन एजेंसी TDPL को झारखंड सरकार पहले ही ब्लैकलिस्ट कर चुकी थी।
सरकार के पुराने वादे और मौजूदा हकीकत में फासला
नवंबर 2024 में जब हेमंत सोरेन ने चौथी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब उन्होंने खुद इस समस्या को स्वीकार करते हुए एक स्पष्ट समयसीमा तय की थी। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद सोरेन ने ऐलान किया था कि 1 जनवरी 2025 से पहले JPSC और JSSC सभी रिक्त पदों के लिए परीक्षा कैलेंडर जारी करेंगे और लंबित परिणाम भी घोषित किए जाएंगे। उस समय भी एक JSSC-CGL परीक्षा पहले ही पेपर लीक के आरोपों में रद्द हो चुकी थी।
फरवरी 2026 में भी यही पैटर्न दोहराया गया — जब आयु सीमा को लेकर छात्रों के दबाव में सरकार को फिर झुकना पड़ा। डुमरी विधायक जयराम महतो और कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव द्वारा विधानसभा में मुद्दा उठाए जाने के बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने 14वीं JPSC परीक्षा के लिए आयु सीमा की कट-ऑफ तिथि 2026 से बदलकर 2022 करने की घोषणा की थी, हालांकि छात्र संगठन इसे 2018 तक ले जाने की मांग कर रहे थे।
यानी बीते डेढ़-दो साल में सरकार बार-बार आंशिक रियायतें देकर आंदोलन को शांत करने की कोशिश करती रही है — कभी आयु सीमा में ढील देकर, कभी परीक्षा रद्द करके, कभी अधिकारियों का इस्तीफा लेकर — लेकिन छात्रों की मूल मांग, यानी एक स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी से पूरे भर्ती तंत्र की जांच, अब तक अनसुनी रही है। यही पैटर्न आज के लाठीचार्ज तक पहुंचने वाले आक्रोश की असली जड़ है।
संपादकीय नोट
यह एक विकसित होती हुई घटना है। लाठीचार्ज को लेकर अब तक प्रशासन या पुलिस की ओर से आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है, न ही घायलों की संख्या की पुष्टि हुई है। Tezkhabar स्थिति पर नजर बनाए हुए है और पुष्ट जानकारी मिलते ही अपडेट करेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. झारखंड पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कब और क्यों किया?
10 अगस्त 2026 को विधानसभा घेराव मार्च के दौरान जब प्रदर्शनकारी छात्र पुलिस बैरिकेड पर चढ़ने लगे, तो सुरक्षाबलों ने वाटर कैनन के बाद लाठीचार्ज का इस्तेमाल किया।
2. क्या सरकार ने पहले लाठीचार्ज न करने का वादा किया था?
हां, मंत्री दीपिका पांडे सिंह ने कहा था कि प्रदर्शनकारी छात्रों के खिलाफ पैलेट गन, आंसू गैस या लाठीचार्ज का इस्तेमाल नहीं किया जाएगा, लेकिन इसके कुछ ही देर बाद पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया।
3. सरकार ने छात्रों की कौन-कौन सी मांगें पहले ही मान ली थीं?
सरकार ने 14वीं JPSC परीक्षा और 2023-25 की बैकलॉग भर्ती परीक्षाएं रद्द करने पर सहमति दी थी और तीन JPSC सदस्यों के इस्तीफे भी मंजूर किए थे, साथ ही CID व ED जांच का ऐलान किया था।
4. छात्र किस मांग पर अड़े हुए हैं?
छात्र सरकार की सभी रियायतों के बावजूद सिर्फ JSSC-CGL परीक्षा गड़बड़ी मामले की CBI जांच की मांग पर अड़े हैं, और इस पर किसी समझौते से इनकार कर रहे हैं।
5. रांची में सुरक्षा व्यवस्था कैसी है?
नई विधानसभा भवन के 750 मीटर के दायरे में (हाईकोर्ट क्षेत्र को छोड़कर) BNS की धारा 163 लागू है, और जगन्नाथ मंदिर वाले रूट पर रेजर-वायर फेंसिंग व भारी बैरिकेडिंग की गई है।
6. झारखंड में JPSC-JSSC पेपर लीक विवाद कब से शुरू हुआ?
यह विवाद 2003 से चला आ रहा है, जब इतिहास के पेपर लीक होने के आरोपों में JPSC को परीक्षा रद्द करनी पड़ी थी। इसके बाद 2021, 2022, 2023, 2024 और 2025 में भी अलग-अलग JPSC-JSSC परीक्षाओं में गड़बड़ियों के आरोप लगते रहे हैं।
7. जांच में अब तक किन बड़े अधिकारियों के नाम सामने आए हैं?
CID जांच में JPSC की डिप्टी कंट्रोलर श्वेता कुमारी गुप्ता और परीक्षा एजेंसी TDPL के निदेशकों की गिरफ्तारी हुई है। जांच का दायरा बढ़ते हुए पूर्व JPSC अध्यक्ष और पूर्व मुख्य सचिव एल. खियांगते तक पहुंचा, जिनसे चार बार पूछताछ हुई और जिन्होंने बाद में इस्तीफा दे दिया।
