FCRA संशोधन बिल 2026 क्या है, संसद में कब पास होगा, NGOs की संपत्ति पर क्या असर होगा और केरल में विरोध क्यों — पूरी डीप एनालिसिस हिंदी में पढ़ें।
देश में इन दिनों एक कानून को लेकर सियासी पारा हाई है — FCRA संशोधन विधेयक 2026। संसद के मानसून सत्र में यह बिल चर्चा के केंद्र में है, केरल विधानसभा इसे वापस लेने की मांग कर चुकी है, चर्च और ईसाई संगठन सड़कों पर उतर चुके हैं, और यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र (UN) के विशेषज्ञ भी इस पर चिंता जता चुके हैं। लेकिन आखिर यह FCRA बिल है क्या, ये किसे प्रभावित करता है, और सरकार इसे क्यों जरूरी बता रही है? आइए पूरी बात आसान भाषा में समझते हैं।
FCRA कानून पहले से क्या है?
- भारत ने पहला FCRA कानून 1976 में बनाया था। बाद में 2010 में इसे एक नए, बड़े और आधुनिक कानून से बदला गया, जिसमें 2016, 2018 और 2020 में और संशोधन हुए।
- 2010 के कानून ने ही 5 साल की रिन्यूएबल रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट व्यवस्था और एकबारगी फंड पाने वालों के लिए ‘प्रायर परमिशन रूट’ शुरू किया — इससे पहले 1976 के कानून में सर्टिफिकेट की कोई समय-सीमा नहीं होती थी।
- इसका मकसद है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल भारत के राष्ट्रीय हित, संप्रभुता, सार्वजनिक व्यवस्था या दूसरे देशों से रिश्तों को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में न हो।
- गृह मंत्रालय के मुताबिक, 2019 से 2022 के बीच 13,520 संस्थाओं को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान मिला। जुलाई 2026 तक FCRA पोर्टल पर 14,449 सक्रिय सर्टिफिकेट, 22,498 रद्द और 15,212 एक्सपायर्ड बताए गए हैं।
नया FCRA संशोधन बिल 2026 — संसद में कब आया, कब पास होगा?
Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill, 2026 को 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था, और यह अभी संसद के विचाराधीन है।
अब सबसे बड़ा सवाल — यह कब पास होगा?
यह बिल संसद के चालू मानसून सत्र में विचार और पारित होने के लिए सूचीबद्ध है। 2020 में FCRA में बड़े बदलाव के बाद से यह भारत के विदेशी फंडिंग नियमन ढांचे में सबसे बड़ा संशोधन माना जा रहा है।
संसद का मानसून सत्र 20 जुलाई 2026 से 13 अगस्त 2026 तक चलना है और इसमें कुल 19 बैठकें होंगी। फिलहाल संसद में 28 बिल लंबित हैं।
यानी, अगर विपक्ष के हंगामे और केरल-मेघालय जैसे राज्यों के विरोध के बावजूद सरकार इसे पेश करने में सफल रहती है, तो यह बिल मानसून सत्र (13 अगस्त 2026 तक) के दौरान ही लोकसभा और राज्यसभा से पास हो सकता है। हालांकि, भारी विरोध को देखते हुए इसे जॉइंट पार्लियामेंट्री कमेटी (JPC) के पास भेजे जाने की भी संभावना जताई जा रही है, जिससे पास होने में देरी हो सकती है।
बिल में क्या-क्या बदलेगा?
1. संस्थाओं की संपत्ति पर सरकारी नियंत्रण (Designated Authority)
बिल एक ‘Designated Authority’ (नामित प्राधिकरण) बनाने का प्रावधान करता है, जिसमें उन संस्थाओं का विदेशी चंदा और उससे बनी संपत्ति निहित (vest) हो जाएगी, जिनका FCRA सर्टिफिकेट रद्द हो गया है, सरेंडर कर दिया गया है, या रिन्यू नहीं हो पाया है।
पहले सिर्फ सर्टिफिकेट रद्द होने या सरेंडर होने पर ही संपत्ति सरकार के पास जाती थी। अब नई बात यह है कि — अगर कोई संस्था अपना सर्टिफिकेट समय पर रिन्यू नहीं कराती, रिन्यूअल के लिए आवेदन ही नहीं करती, या उसका रिन्यूअल आवेदन खारिज हो जाता है — तो भी उसकी संपत्ति इस Designated Authority के पास चली जाएगी।
2. संपत्ति वापस कब मिलेगी, कब नहीं?
जब तक संस्था को नया सर्टिफिकेट नहीं मिलता या पुराना रिन्यू/बहाल नहीं होता, तब तक यह ‘वेस्टिंग’ अस्थायी रहेगी। अगर तय समय के भीतर ऐसा नहीं होता, तो यह वेस्टिंग स्थायी हो जाएगी।
एक बार संपत्ति स्थायी रूप से सरकार के पास चली जाए, तो Designated Authority इसे सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करेगी, इसे सरकारी मंत्रालयों या विभागों को ट्रांसफर कर सकती है, या बेच सकती है। बिक्री से मिली रकम भारत की संचित निधि (Consolidated Fund of India) में जमा होगी।
3. पूजा स्थलों के लिए विशेष प्रावधान
एक राहत की बात यह है कि अगर वेस्टेड संपत्ति पूरी तरह या आंशिक रूप से कोई पूजा स्थल है, तो Designated Authority को उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी तय तरीके से किसी व्यक्ति को सौंपनी होगी, और उसके धार्मिक स्वरूप को बनाए रखना अनिवार्य होगा।
4. सजा घटाई गई, लेकिन जांच पर सरकारी अनुमति जरूरी
अभी तक कानून तोड़ने पर अधिकतम 5 साल तक की कैद, जुर्माना, या दोनों का प्रावधान था। नया बिल अधिकतम कैद की सजा घटाकर 1 साल कर देता है। लेकिन साथ ही यह भी जोड़ता है कि किसी भी अपराध की जांच शुरू करने के लिए केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।
5. ‘की फंक्शनरीज़’ यानी जिम्मेदार व्यक्तियों की नई परिभाषा
बिल संस्था के ‘की फंक्शनरीज़’ को परिभाषित करता है, जिनमें कंपनी के डायरेक्टर, फर्म का पार्टनर, ट्रस्ट का ट्रस्टी, हिंदू अविभाजित परिवार का कर्ता, और सोसाइटी/ट्रेड यूनियन के पदाधिकारी शामिल हैं। इन्हें संस्था के अपराध के लिए जिम्मेदार माना जाएगा, जब तक वे यह साबित न कर दें कि यह उनकी जानकारी के बिना हुआ या उन्होंने पूरी सावधानी बरती थी।
6. संस्था बंद होने पर सूचना देने की अनिवार्यता
अगर कोई संस्था बंद हो जाती है या निष्क्रिय हो जाती है, तो बिल आखिरी ‘की फंक्शनरीज़’ पर केंद्र सरकार को इसकी सूचना देने की कानूनी जिम्मेदारी डालता है। ऐसा न करने पर संस्था का विदेशी चंदा स्थायी रूप से Designated Authority में चला जाएगा।
सरकार इसे जरूरी क्यों बता रही है?
सरकार का तर्क है कि यह बिल कोई नई पाबंदी नहीं, बल्कि मौजूदा कानून की खामियों को दूर करता है।
- हर संशोधन एक ही दिशा में गया है — पारदर्शिता और हिसाब-किताब को सख्त बनाना, न कि वैध गतिविधियों पर नई रोक लगाना। प्रतिबंधित गतिविधियों की श्रेणियां (संप्रभुता, सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था या मित्र देशों से रिश्तों पर असर) 1976 से लगभग वैसी ही बनी हुई हैं।
- बिल का मकसद विदेशी फंड्स को इस तरह नियंत्रित करना है ताकि वे राष्ट्रीय हित, सार्वजनिक व्यवस्था या सुरक्षा को नुकसान न पहुंचाएं।
- संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने केरल में कहा — मौजूदा संशोधन का मकसद विदेशी चंदे के बेहतर नियमन और उसके सही इस्तेमाल को सुनिश्चित करना है। यह बिल राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखते हुए लाया गया है, ताकि विदेश से मिलने वाला पैसा पारदर्शी तरीके से और तय मकसद के लिए ही खर्च हो।
- रिजिजू ने यह भी साफ किया कि यह संशोधन किसी धर्म के खिलाफ नहीं है और किसी खास संगठन को निशाना नहीं बनाता।
विरोध क्यों हो रहा है? केरल कनेक्शन
अब सिक्के का दूसरा पहलू — विरोध की वजहें।
इस बिल ने केरल विधानसभा से इसे वापस लेने की मांग वाला प्रस्ताव पास कराया है, ईसाई चर्चों और मिशनरी संगठनों का विरोध झेला है, एमनेस्टी इंटरनेशनल और संयुक्त राष्ट्र के तीन विशेष प्रतिवेदकों (Special Rapporteurs) की चिंता खींची है, और वित्तीय कार्रवाई कार्य बल (FATF) की चेतावनी भी सामने आई है।
केरल विधानसभा के प्रस्ताव में कहा गया कि ये संशोधन दान और स्वैच्छिक संगठनों पर गंभीर प्रतिकूल असर डालते हैं, नागरिक समाज संगठनों की स्वायत्तता और लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को कमजोर करते हैं, और अंतर-राज्यीय कामकाज में व्यावहारिक अड़चनें पैदा करते हैं। प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि ये संशोधन संविधान के अनुच्छेद 19, 20 और 25 का उल्लंघन करते हैं, संघवाद के सिद्धांतों के खिलाफ हैं।
मेघालय में भी विरोध तेज है — मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड के संगमा ने प्रेस्बिटेरियन चर्च, कैथोलिक चर्च और गारो बैपटिस्ट कन्वेंशन के प्रतिनिधियों के साथ केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की। उनका तर्क सीधा था — मेघालय में चर्च द्वारा चलाए जा रहे स्कूल, अस्पताल और सामुदायिक कार्यक्रम विदेश से मिलने वाले दान पर निर्भर हैं, और वे उन जगहों पर सेवा देते हैं जहां सरकारी सेवाएं मुश्किल से पहुंच पाती हैं।
DMK सांसद पी. विल्सन ने आरोप लगाया कि यह बिल अल्पसंख्यक संगठनों को दुश्मन की तरह मानता है और उनकी संपत्तियां हड़पने के लिए लाया गया है।
आलोचकों की मुख्य चिंताएं (एक्सपर्ट एनालिसिस)
संसद की अपनी थिंक-टैंक PRS Legislative Research ने भी बिल की कुछ खामियां गिनाई हैं:
- सुनवाई और अपील का कोई मौका नहीं — न तो मौजूदा कानून और न ही यह बिल, रिन्यूअल न देने से पहले संस्था को सुनवाई का मौका देने का प्रावधान करता है। मौजूदा कानून सर्टिफिकेट रद्द होने या करेंसी जब्त होने की स्थिति में ऐसा मौका देता है, लेकिन रिन्यूअल न मिलने पर संस्था के पास अपील का कोई रास्ता नहीं बचता।
- FCRA से बाहर निकलने का कोई तरीका नहीं — अगर कोई संस्था अब विदेशी फंडिंग नहीं भी लेना चाहती, फिर भी अपनी पुरानी विदेशी-फंड से बनी संपत्ति बचाए रखने के लिए उसे हमेशा अपना सर्टिफिकेट रिन्यू कराते रहना होगा।
- आंशिक विदेशी फंडिंग पर भी पूरी संपत्ति जब्ती — भले ही किसी अस्पताल या स्कूल का सिर्फ एक हिस्सा विदेशी चंदे से बना हो, पूरी संपत्ति Designated Authority में जा सकती है।
- 10 लाख रुपये की शर्त — नए FCRA नियमों के मुताबिक, अगर किसी संस्था ने पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये का विदेशी चंदा इस्तेमाल नहीं किया, तो उसे ‘समाज के लिए उचित गतिविधि’ न करने वाला माना जाएगा — जिससे छोटी संस्थाओं (जैसे गांव की लाइब्रेरी चलाने वाली संस्था) का सर्टिफिकेट रद्द हो सकता है।
सरकार का पक्ष बनाम विपक्ष की आपत्ति — एक नजर में
| मुद्दा | सरकार का तर्क | विपक्ष/आलोचकों की आपत्ति |
| मकसद | राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता | अल्पसंख्यक संस्थाओं को निशाना बनाना |
| सजा | 5 साल से घटाकर 1 साल — नरमी | जांच के लिए सरकारी अनुमति अनिवार्य — नया नियंत्रण |
| संपत्ति | कानून तोड़ने वालों पर कार्रवाई | बिना सुनवाई/अपील के संपत्ति जब्ती संभव |
| दायरा | पहले से मौजूद ढांचे का विस्तार | 2020 के बाद सबसे बड़ा और सख्त बदलाव |
निष्कर्ष
FCRA संशोधन बिल 2026 सिर्फ एक तकनीकी कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि भारत में NGOs, चर्च संस्थाओं, ट्रस्ट्स और स्वयंसेवी संगठनों की आर्थिक स्वायत्तता से जुड़ा बड़ा सवाल बन गया है। सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता से जोड़कर देख रही है, जबकि विपक्ष और सिविल सोसाइटी इसे संपत्ति जब्ती और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर दबाव का हथियार बता रहे हैं। मानसून सत्र में इस पर संसद में क्या होता है — पास होता है, JPC के पास जाता है, या टलता है — यह आने वाले दिनों की सबसे बड़ी राजनीतिक-कानूनी खबर होगी।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)
1. FCRA बिल क्या है?
FCRA यानी Foreign Contribution (Regulation) Act — यह भारत का कानून है जो व्यक्तियों, NGOs और संस्थाओं को मिलने वाले विदेशी चंदे को नियंत्रित करता है। FCRA संशोधन बिल 2026 इसी कानून में बदलाव करने के लिए लाया गया है।
2. FCRA संशोधन बिल 2026 संसद में कब पेश हुआ?
यह बिल 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था।
3. FCRA बिल संसद में कब पास होगा?
यह बिल संसद के मानसून सत्र (20 जुलाई से 13 अगस्त 2026) में विचार और पारित होने के लिए सूचीबद्ध है, हालांकि भारी विरोध के चलते इसे संसदीय समिति के पास भी भेजा जा सकता है।
4. FCRA बिल से सबसे बड़ा बदलाव क्या होगा?
सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अगर कोई संस्था अपना FCRA सर्टिफिकेट रिन्यू नहीं कराती या रिन्यूअल खारिज हो जाता है, तो उसकी विदेशी फंड से बनी संपत्ति एक नई ‘Designated Authority’ के पास चली जाएगी।
5. क्या FCRA बिल से सजा बढ़ेगी या घटेगी?
सजा घटेगी — अधिकतम कैद 5 साल से घटाकर 1 साल कर दी गई है, लेकिन जांच शुरू करने के लिए अब सरकार की पूर्व अनुमति जरूरी होगी।
6. केरल में FCRA बिल का विरोध क्यों हो रहा है?
केरल में बड़ी संख्या में ईसाई मिशनरी संस्थाएं, स्कूल और अस्पताल विदेशी चंदे पर निर्भर हैं। केरल विधानसभा ने प्रस्ताव पास कर इस बिल को असंवैधानिक और अल्पसंख्यक-विरोधी बताते हुए वापस लेने की मांग की है।
7. क्या FCRA बिल किसी धर्म विशेष के खिलाफ है?
केंद्र सरकार का कहना है कि यह बिल किसी धर्म या संगठन विशेष के खिलाफ नहीं है और सिर्फ पारदर्शिता व राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए लाया गया है। हालांकि विपक्ष और चर्च संगठन इससे असहमत हैं।
8. अगर कोई संस्था FCRA से बाहर निकलना चाहे तो क्या होगा?
विशेषज्ञों के मुताबिक, मौजूदा बिल में संस्था के लिए बिना अपनी विदेशी फंड से बनी संपत्ति खोए FCRA फ्रेमवर्क से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं है।
स्रोत: PRS Legislative Research, PIB, Vajiram & Ravi, LawStreet, News On Air, The Federal (31 जुलाई 2026 तक की जानकारी पर आधारित)
