TMC MPs Merger Case:क्या TMC के 20 बागी सांसदों का नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया NCPI में विलय कानूनी रूप से वैध है? जानिए दल-बदल कानून (Anti-Defection Law) की वे कमियां और सुप्रीम कोर्ट के फैसले, जो इन सांसदों की सदस्यता पर संकट ला सकते हैं। पूरा गहरा विश्लेषण।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में आया भूचाल अब दिल्ली के गलियारों में कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय की मांग की है।
काकोली घोष दस्तीदार, सुदीप बंदोपाध्याय और शताब्दी रॉय जैसे दिग्गजों की अगुवाई वाले इस गुट का दावा है कि उनके पास दो-तिहाई (20/28) का बहुमत है, इसलिए उन पर दल-बदल कानून लागू नहीं होगा। लेकिन संविधान विशेषज्ञों और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों पर नजर डालें, तो यह ‘ठिकाना’ किसी शेल कंपनी या पश्चिम बंगाल के होल्डिंग सेंटर जैसा ही नजर आता है। आइए समझते हैं इस पूरे मामले का गहरा कानूनी और राजनीतिक विश्लेषण।
NCPI: ₹75 के बैलेंस वाली पार्टी अचानक बनी ‘सहारा’
जिस NCPI पार्टी को इन बागी सांसदों ने चुना है, उसका इतिहास बेहद चौंकाने वाला है।
- पंजीकरण: जनवरी 2023 में चुनाव आयोग के पास पंजीकृत हुई यह एक गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी है।
- चुनावी वजूद: 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी को महज कुछ सौ वोट मिले थे और कभी इसके बैंक खाते में सिर्फ ₹75 बचे होने की खबरें थीं।
- रणनीति: जानकारों का मानना है कि इस गुमनाम पार्टी को सिर्फ इसलिए चुना गया ताकि सांसद अपनी बंगाली/पूर्वोत्तर की पहचान भी बनाए रखें और भाजपा (NDA) को बाहर से समर्थन देने का एक कानूनी रास्ता भी निकाल सकें।
संवैधानिक पेच: क्यों यह ‘विलय’ अयोग्यता का कारण बन सकता है?
बागी सांसदों ने खुद को सुरक्षित रखने के लिए दो-तिहाई संख्या बल का सहारा तो ले लिया है, लेकिन Tenth Schedule (दसवीं अनुसूची) का पैराग्राफ 4 उनके रास्ते का सबसे बड़ा रोड़ा बन सकता है। देश के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल और पूर्व लोकसभा महासचिव पीडीटी आचारी के अनुसार, इस कदम में दो बड़ी कानूनी खामियां हैं:
1. ‘विभाजन’ (Split) बनाम ‘विलय’ (Merger) का अंतर
साल 1985 में जब 52वां संविधान संशोधन आया, तब 1/3 सदस्यों के टूटने (Split) पर छूट थी। लेकिन 2003 के 91वें संविधान संशोधन द्वारा ‘स्प्लिट’ के प्रावधान को पूरी तरह खत्म कर दिया गया। अब केवल ‘मर्जर’ (विलय) ही मान्य है।
2. ‘ट्विन टेस्ट’ (Twin Test) की अनिवार्यता
कानून के मुताबिक, किसी भी विलय को वैध मानने के लिए दो शर्तों का पूरा होना जरूरी है:
- मूल राजनीतिक दल (Original Political Party) का विलय: मूल पार्टी (ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली TMC) को किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करना होगा।
- विधायक/संसदीय दल (Legislature Party) की सहमति: उस पार्टी के कम से कम दो-तिहाई निर्वाचित सदस्य इस फैसले से सहमत हों।
विशेषज्ञों का तर्क: यहां सिर्फ ‘लेजिस्लेचर पार्टी’ (सांसदों) ने विलय का फैसला किया है, ‘ओरिजिनल पॉलिटिकल पार्टी’ (TMC) ने नहीं। सांसद खुद को मूल पार्टी से अलग घोषित करके किसी अन्य दल में खुद को ‘मर्ज’ नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले और विरोधाभास
इस मामले में कानूनी राय बंटी हुई है और दोनों पक्षों के पास अपने-अपने तर्क हैं:
- बागी गुट का तर्क (गोवा हाई कोर्ट का फैसला): साल 2022 में बॉम्बे हाई कोर्ट की गोवा बेंच ने कांग्रेस विधायकों के भाजपा में विलय को सही ठहराया था, जहां कोर्ट ने दो-तिहाई विधायी बहुमत को ही पर्याप्त माना था (यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है)।
- TMC का तर्क (सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल केस): सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के शिवसेना विवाद में साफ कहा था कि पॉलिटिकल पार्टी और लेजिस्लेचर पार्टी दो अलग चीजें हैं। विधायिका दल के नेता या सांसद अपनी मर्जी से पार्टी का अस्तित्व तय नहीं कर सकते।
क्या होगा सांसदों का भविष्य?
जब तक लोकसभा स्पीकर ओम बिरला इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लेते, तब तक ये बागी सांसद तकनीकी रूप से TMC के ही सदस्य रहेंगे। संसद सत्र के दौरान अगर वे पार्टी के व्हिप (Whip) का उल्लंघन करते हैं, तो उन पर अयोग्यता (Disqualification) का खतरा और बढ़ जाएगा।
यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि कैसे राजनेता दल-बदल विरोधी कानून की बारीकियों का इस्तेमाल करके जनता के जनादेश को ठेंगा दिखाते हैं। क्या सुप्रीम कोर्ट इस ‘शेल पार्टी’ वाले मर्जर पर फुल स्टॉप लगाएगा या फिर आया राम-गया राम की राजनीति का यह नया मॉडल देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को और बौना कर देगा? यह आने वाला वक्त तय करेगा।
