ममता बनर्जी का किला ध्वस्त? 58 विधायक और 20 सांसदों की बगावत के बाद अब क्या होगा? ये 9 संभावनाएं तय करेंगी ‘असली TMC’ का भविष्य

TMC me foot

पश्चिम बंगाल चुनाव में हार के बाद ममता बनर्जी का किला ध्वस्त TMC में इतिहास की सबसे बड़ी बगावत हो चुकी है। 58 विधायकों और 20 सांसदों के बागी होने के बाद अब बंगाल और देश की राजनीति में क्या बदलाव आएंगे? जानिए वो 9 बड़ी संभावनाएं जो ‘असली TMC’ का भविष्य तय करेंगी।

पश्चिम बंगाल में इस साल (2026) हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने न सिर्फ राज्य की सत्ता बदली, बल्कि ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर एक ऐसे ऐतिहासिक बिखराव की जमीन भी तैयार कर दी, जिसकी कल्पना शायद खुद ममता बनर्जी ने भी नहीं की थी। चुनाव में मिली हार के ठीक 14 दिन बाद, यानी 18 मई को शुरू हुई यह आंतरिक बगावत अब एक बेहद नाजुक और निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है।

विधानसभा में ऋतव्रत बनर्जी (Ritabrata Banerjee) और लोकसभा में वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तीदार (Kakoli Ghosh Dastidar) की अगुवाई में तृणमूल कांग्रेस के दो-तिहाई से अधिक सांसदों और विधायकों ने बगावती रुख अख्तियार कर लिया है। महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे बनाम एकनाथ शिंदे और लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) में पारस बनाम चिराग वाले घटनाक्रम की तर्ज पर अब बंगाल में भी ‘असली’ पार्टी की लड़ाई शुरू हो चुकी है।

मौजूदा जमीनी हालातों और सियासी आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर, आने वाले दिनों में पश्चिम बंगाल और देश की राजनीति में 9 बड़ी संभावनाएं इस प्रकार आकार ले सकती हैं:

1. कानूनी और तकनीकी लड़ाई (स्पीकर बनाम अदालत)

बागी धड़े के पास विधानसभा (80 में से 58) और लोकसभा (28 में से 20) दोनों ही जगह दलबदल कानून से बचने के लिए जरूरी दो-तिहाई से ज्यादा का आंकड़ा मौजूद है। यही वजह है कि विधानसभा अध्यक्ष (स्पीकर) ने पहले ही बागी गुट को सदन में मान्यता दे दी है। इसके जवाब में ममता बनर्जी का वफादार खेमा (कल्याण बनर्जी और कीर्ति आजाद) बहुत जल्द इस फैसले और बागियों के हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता को कलकत्ता हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता है। आने वाले दिनों में अदालती स्टे, याचिकाओं और तीखे कानूनी दांवपेंच का दौर तेज होने वाला है।

दलबदल कानून का गणित (TMC की मौजूदा स्थिति)

भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत किसी भी दल के बागी धड़े को संसद या विधानसभा में अपनी सदस्यता बचाए रखने के लिए मूल पार्टी के कम से कम दो-तिहाई (2/3) निर्वाचित सदस्यों का समर्थन होना अनिवार्य है। TMC में यह समीकरण इस तरह बैठता है:

सदनकुल सदस्य (TMC)कानूनी मान्यता के लिए जरूरी (2/3)बागी सदस्यों की संख्यास्थिति
लोकसभा281920 (19 के दस्तखत सामने आए)सुरक्षित (दलबदल कानून लागू नहीं होगा)
विधानसभा805458 (अब दावा 64 का है)सुरक्षित (स्पीकर ने विपक्षी गुट माना)

इसके अलावा राज्यसभा में भी संकट गहराया हुआ है, जहां सुष्मिता देव, सुकेंदु शेखर राय और प्रकाश चिक बड़ाईक सहित 3 सांसदों ने उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया है।

3. संगठन में ‘काउंटर-पोचिंग’ और नई फूट का खतरा

यह राजनीतिक लड़ाई सिर्फ कोलकाता के विधानसभा भवन या दिल्ली के संसद मार्ग तक सीमित नहीं रहने वाली है। आने वाले दिनों में जिला परिषदों, नगर पालिकाओं और ब्लॉक स्तर के स्थानीय नेताओं को भी किसी एक पाले को चुनना होगा। इसी बीच, ममता बनर्जी ने भी डैमेज कंट्रोल की रणनीति के तहत बागी खेमे में सेंधमारी (Counter-Poaching) शुरू कर दी है। विशेषकर ग्रामीण और अल्पसंख्यक विधायकों को वापस अपने पाले में लाने के लिए ममता खेमा ‘इमोशनल कार्ड’ और स्थानीय राजनीतिक दबाव का इस्तेमाल कर रहा है, जिससे बागी गुट के भीतर भी आंतरिक खींचतान देखने को मिल सकती है।

4. ममता बनर्जी का आक्रामक डैमेज कंट्रोल

ममता बनर्जी इस पूरे संकट को “बाहरी ताकतों (BJP) द्वारा थोपी गई और केंद्रीय एजेंसियों द्वारा प्रायोजित साजिश” के रूप में जनता के बीच ले जा रही हैं। वह बहुत जल्द संगठन का पूरी तरह से पुनर्गठन (Reorganization) कर सकती हैं। भतीजे अभिषेक बनर्जी के फैसलों पर उठे सवालों के बाद, जमीन पर कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटने से बचाने के लिए ममता बनर्जी पुरानी पीढ़ी के वफादार नेताओं (जैसे शोभनदेव चट्टोपाध्याय) को दोबारा अहम जिम्मेदारियां सौंपकर आगे कर सकती हैं।

5. भाजपा (BJP) का ‘वेट एंड वॉच’ और रणनीतिक फायदा

पश्चिम बंगाल में नवगठित सरकार (मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में) इस पूरे आंतरिक घटनाक्रम पर पैनी नजर रखे हुए है। केंद्रीय मंत्रियों के आवास पर बागी टीएमसी सांसदों की गुप्त बैठकों से यह साफ है कि भाजपा इस फूट का पूरा राजनीतिक लाभ उठाने की तैयारी में है। हालांकि, भाजपा सीधे तौर पर इन बागियों को अपनी पार्टी में शामिल करने का जोखिम नहीं उठाएगी; इसके बजाय वह उन्हें टीएमसी के ही नाम से केंद्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार को बाहर से समर्थन देने के लिए प्रोत्साहित कर रही है ताकि जनता के बीच ‘पार्टी तोड़ने’ का कोई नकारात्मक संदेश न जाए।

6. स्थानीय निकायों और आगामी उपचुनावों पर सीधा असर

यदि यह फूट स्थायी रूप से दो अलग-अलग धड़ों में बदल जाती है, तो बंगाल का पारंपरिक तृणमूल वोट बैंक जमीनी स्तर पर पूरी तरह से बंट जाएगा। इसका सीधा और बड़ा असर भविष्य में होने वाले स्थानीय निकाय चुनावों और खाली होने वाली सीटों पर होने वाले उपचुनावों (जैसे राज्यसभा से सांसदों के इस्तीफे के बाद) में देखने को मिलेगा। विपक्ष के वोटों का यह बिखराव सीधे तौर पर सत्ताधारी दल (BJP) के पक्ष में जा सकता है।

7. ‘नई टीएमसी’ या अलग क्षेत्रीय दल का उदय

ऋतव्रत बनर्जी और काकोली घोष दस्तीदार का गुट खुद को ही “वास्तविक और असली टीएमसी” बता रहा है। लेकिन यदि चुनाव आयोग या अदालती लड़ाई में उन्हें मूल सिंबल (जोड़ा घास फूल) नहीं मिल पाता है, तो यह बागी गुट निर्वाचन आयोग में एक नया क्षेत्रीय दल (जैसे ‘तृणमूल कांग्रेस-सेक्युलर’ या ‘राष्ट्रवादी तृणमूल कांग्रेस’) पंजीकृत करा सकता है, जो आधिकारिक तौर पर केंद्र में एनडीए का सहयोगी दल बनकर उभरेगा।

8. ‘INDIA’ गठबंधन की राष्ट्रीय राजनीति पर असर

ममता बनर्जी राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी ‘INDIA’ ब्लॉक का एक बेहद मजबूत और आक्रामक चेहरा रही हैं। इस आंतरिक बगावत और सांसदों की संख्या अचानक घटने (लोकसभा में केवल 8 और राज्यसभा में 9 सांसद बचने) के कारण राष्ट्रीय राजनीति और विपक्षी मोर्चे के भीतर ममता बनर्जी की मोलतोल करने की ताकत (Bargaining Power) काफी कमजोर हो जाएगी। इसके बाद कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय विपक्ष की धुरी में अधिक हावी हो सकते हैं।

9. सबसे बड़ा सवाल: ‘TMC’ और उसकी विरासत अब किसकी?

यह लड़ाई सिर्फ विधायकों और सांसदों की संख्या गिनने की नहीं है, बल्कि यह ममता बनर्जी की 28 साल पुरानी राजनीतिक विरासत, उनके संघर्षों और जन-आंदोलन की पहचान को हथियाने की है। बागी गुट का तर्क है कि वे ममता के मूल सिद्धांतों की रक्षा के लिए अभिषेक बनर्जी के एकाधिकार के खिलाफ खड़े हुए हैं, जबकि ममता खेमा इसे खुला विश्वासघात कह रहा है। आने वाले महीनों में असली और अंतिम परीक्षा बंगाल की जनता की अदालत में होगी कि वह आज भी “दीदी” के चेहरे के साथ खड़ी रहती है या इस नए बागी नेतृत्व को स्वीकार करती है।

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