Mahatma Gandhi पोरबंदर से लंदन कैसे पहुंचे? वे ‘महात्मा’ और ‘राष्ट्रपिता’ कैसे बने? जानें बापू की शिक्षा, उनके राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और अंग्रेजों के खिलाफ उनके प्रमुख आंदोलनों की पूरी कहानी।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी यानी हमारे प्यारे ‘बापू’ को कौन नहीं जानता? स्कूल की किताबों से लेकर सरकारी दफ्तरों की दीवारों और हमारी जेब में रखे नोटों तक, गांधी जी हर जगह मौजूद हैं। हम सब जानते हैं कि उन्होंने देश को आजाद कराने के लिए लाठी उठाई और अहिंसा का रास्ता चुना।
लेकिन क्या गांधी जी का व्यक्तित्व सिर्फ इतना ही था? बिल्कुल नहीं! इतिहास के पन्नों के पीछे मोहनदास करमचंद गांधी के जीवन की एक ऐसी दुनिया भी थी, जो बेहद दिलचस्प, अनोखी और कई जगह हैरान कर देने वाली है। आज इस ब्लॉग में हम बापू के जीवन के उन्हीं अनसुने पन्नों को पलटेंगे और जानेंगे महात्मा गांधी का शिक्षा से लेकर राष्ट्रपिता बनने का पूरा सफर।
🎓 Mahatma Gandhi जी की शिक्षा का सफर: पोरबंदर से लंदन तक
गांधी जी की शिक्षा ने न केवल उन्हें एक वकील बनाया, बल्कि उनके पूरे व्यक्तित्व और विचारधारा को आकार दिया:
- प्रारंभिक शिक्षा: गांधी जी की प्रारंभिक शिक्षा पोरबंदर और राजकोट में हुई। वे एक औसत (Average) छात्र थे, और उनका शुरुआती स्कूल जीवन विशेष रूप से उल्लेखनीय नहीं था। उन्होंने राजकोट के अल्फ्रेड हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा पास की।
- कॉलेज की पढ़ाई: मैट्रिक के बाद, 1888 में गांधी जी ने भावनगर के श्यामलदास कॉलेज (अब सामलदास आर्ट्स कॉलेज) में प्रवेश लिया, लेकिन स्वास्थ्य और पारिवारिक कारणों से वह वहां अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर सके।
- लंदन में वकालत की पढ़ाई: गांधी जी ने 1888 में ही इंग्लैंड के लंदन जाकर कानून की पढ़ाई करने का निर्णय लिया। वहां उन्होंने ‘इनर टेम्पल’ लॉ कॉलेज में दाखिला लिया और 1891 में बैरिस्टर (वकील) की डिग्री हासिल की। इंग्लैंड में रहते हुए उन्होंने पश्चिमी जीवनशैली, भोजन और रहन-सहन के तरीकों से काफी संघर्ष किया, लेकिन वे अंततः एक बैरिस्टर के रूप में सफल हुए।
- वकालत का आरंभ: 1891 में भारत लौटकर गांधी जी ने वकालत शुरू की, लेकिन शुरुआत में उन्हें खास सफलता नहीं मिली। 1893 में वे एक केस के सिलसिले में दक्षिण अफ्रीका गए, जहाँ उनकी वकालत के साथ-साथ राजनीतिक जागरूकता की यात्रा भी शुरू हुई। यहीं से उन्होंने नस्लीय भेदभाव और अन्याय के खिलाफ संघर्ष की नींव रखी।
1. खराब हैंडराइटिंग का ताउम्र रहा मलाल
गांधी जी का मानना था कि अच्छी लिखावट (Handwriting) शिक्षा का एक बेहद जरूरी हिस्सा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि वे खुद अपनी खराब हैंडराइटिंग से काफी परेशान रहते थे। अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में उन्होंने साफ लिखा है कि वे अपनी इस कमी पर जीवनभर पछताते रहे और युवाओं को हमेशा अपनी लिखावट सुधारने की सलाह देते रहे।
2. बचपन का डरपोक स्वभाव और भयंकर ‘स्टेज फियर’
लंदन से वकालत पढ़कर लौटे बैरिस्टर गांधी कभी मंच पर बोलने से डरते थे, इस बात पर यकीन करना मुश्किल है। बचपन में मोहनदास बेहद शर्मीले थे और उन्हें अंधेरे से बहुत डर लगता था। जब वे बॉम्बे कोर्ट में अपना पहला केस लड़ने खड़े हुए, तो घबराहट के मारे उनके पैर कांपने लगे। वे कोर्ट में एक शब्द भी नहीं बोल पाए और आखिरकार अपनी फीस वापस करके वहां से चले गए।
3. फुटबॉल के दीवाने थे बापू: शुरू किए थे दो क्लब
साउथ अफ्रीका में रहने के दौरान गांधी जी ने फुटबॉल को सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि सामाजिक काम और लोगों को एकजुट करने का जरिया बनाया। उन्होंने जोहान्सबर्ग और प्रिटोरिया में दो फुटबॉल क्लब शुरू किए थे, जिनका नाम था ‘पैसिव रेजिस्टर्स क्लब’ (Passive Resisters Club)।
4. 5 बार नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नॉमिनेशन, पर कभी मिला नहीं
दुनिया में अहिंसा के सबसे बड़े प्रतीक होने के बावजूद गांधी जी को कभी नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला। उन्हें 1937, 1938, 1939, 1947 और 1948 (उनकी मृत्यु से कुछ दिन पहले) में नामांकित (Nominate) किया गया था। नोबेल कमेटी ने बाद में इस बात पर गहरा अफसोस भी जताया कि वे गांधी जी को यह पुरस्कार नहीं दे सके।
5. नकली बत्तीसी का अनोखा राज
गांधी जी के मुंह में दांत नहीं थे, लेकिन वे अपनी नकली बत्तीसी (Dentures) सिर्फ खाना खाते समय ही मुंह में लगाते थे। खाना खाने के बाद वे उसे धोकर अपने पास रख लेते थे और जब भी लोगों से मिलते, तो बिना दांतों के ही खुलकर मुस्कुराते थे।
क्या आप जानते हैं? गांधी जी रोज लगभग 18 किलोमीटर पैदल चलते थे। अपने पूरे जीवनकाल में वे जितना पैदल चले, अगर उसका हिसाब लगाया जाए तो उन्होंने पूरी पृथ्वी के दो चक्कर काटने जितनी दूरी पैदल ही तय कर ली थी!
👥 महात्मा गांधी के राजनैतिक गुरु कौन थे?
गांधी जी के राजनैतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले थे, जो अपने समय के एक महान उदारवादी नेता थे। गोखले जी ‘साध्य एवं साधन दोनों की पवित्रता’ (यानी अच्छा नतीजा पाने के लिए रास्ता भी उतना ही अच्छा और सच्चा होना चाहिए) में गहरा विश्वास करते थे। गोखले जी के इसी विचार से प्रेरित होकर गांधी जी ने उन्हें अपना गुरु बना लिया था और भारत की राजनीति को समझा था।
⚔️ अंग्रेजों के खिलाफ गांधी जी के प्रमुख आंदोलन
भारत लौटने के बाद गांधी जी ने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ कई बड़े और ऐतिहासिक आंदोलन शुरू किए, जिन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी:
- 1917 – चंपारण आंदोलन: बिहार के किसानों को नील की जबरन खेती से मुक्ति दिलाने के लिए भारत में उनका पहला सफल सत्याग्रह।
- 1918 – खेड़ा आंदोलन: गुजरात के खेड़ा में फसल नष्ट होने के बाद किसानों का लगान (टैक्स) माफ कराने का संघर्ष।
- 1919 – खिलाफत आंदोलन: तुर्की के खलीफा के समर्थन और हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करने के लिए चलाया गया आंदोलन।
- 1920 – असहयोग आंदोलन: अंग्रेजी सरकार की चीजों, स्कूलों और नौकरियों का बहिष्कार करने का पहला देशव्यापी आंदोलन।
- 1930 – सविनय अवज्ञा आंदोलन (दांडी मार्च): नमक कानून तोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ सविनय अवज्ञा (Civil Disobedience) की शुरुआत की।
- 1942 – भारत छोड़ो आंदोलन: अंग्रेजों को भारत से बाहर खदेड़ने के लिए बापू का सबसे बड़ा आंदोलन, जिसमें उन्होंने “करो या मरो” का नारा दिया था।
🎖️ मोहनदास करमचंद गांधी ‘महात्मा’ कैसे बने?
हम सब उन्हें ‘महात्मा’ गांधी कहते हैं, लेकिन यह उनकी उपाधि है। इतिहास के अनुसार, उन्हें “महात्मा” की उपाधि रवींद्रनाथ टैगोर ने प्रदान की थी। हालांकि, कुछ इतिहासकारों का यह भी मानना है कि गांधी जी को सबसे पहली बार साल 1915 में जेतपुर (गुजरात) के वैद्य जीवन राम कालिदास ने ‘महात्मा’ कहकर संबोधित किया था।
🇮🇳 महात्मा गांधी ‘राष्ट्रपिता’ कैसे बने?
गांधी जी को सबसे पहले ‘राष्ट्रपिता’ की उपाधि किसी अंग्रेज या सरकार ने नहीं, बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के महान नायक नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने दी थी।
4 जून 1944 को सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए महात्मा गांधी को पहली बार ‘राष्ट्रपिता’ कहकर संबोधित किया था। बाद में इस सम्मानजनक उपाधि को भारत सरकार द्वारा भी स्वीकार किया गया।
जब 30 जनवरी 1948 को गांधी जी का निधन हुआ, तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने भारी मन से रेडियो पर राष्ट्र को संबोधित करते हुए यही शब्द दोहराए थे कि— “राष्ट्रपिता अब हमारे बीच नहीं रहे।”
6. समय के पक्के: कमर पर लटकती ‘डॉलर वॉच’
गांधी जी समय के इतने पाबंद थे कि वे अपनी कमर पर हमेशा एक डॉलर के आकार की घड़ी (Dollar Watch) लटका कर रखते थे।
एक दुखद वाकया: 30 जनवरी 1948 को, जिस दिन उनकी हत्या हुई, उस दिन वे अपनी प्रार्थना सभा के लिए मात्र 2 मिनट लेट हो गए थे। वे अपनी पोतियों (आभा और मनु) से कह रहे थे कि “मुझे आज देर हो गई है, मुझे समय का पाबंद होना चाहिए था।”
7. पसंदीदा भजन ‘वैष्णव जन’ और मुस्लिम गायिका का कनेक्शन
गांधी जी का सबसे प्रिय भजन था—“वैष्णव जन तो तेने कहिए जे पीर पराई जाणे रे…”। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में गूंजने वाले इस भजन को पहली बार व्यावसायिक रूप से (Commercially) साल 1907 में ‘अमीरबाई कर्नाटकी’ नामक एक प्रसिद्ध मुस्लिम गायिका ने रिकॉर्ड किया था।
8. स्टीव जॉब्स और गांधी जी के ‘चश्मे’ का कनेक्शन
एप्पल (Apple) कंपनी के संस्थापक स्टीव जॉब्स गांधी जी से बेहद प्रभावित थे। जब उन्होंने 1997 में एप्पल की मशहूर विज्ञापन टैगलाइन “Think Different” लॉन्च की, तो उसके पोस्टर में महात्मा गांधी की तस्वीर लगाई थी। यहाँ तक कि स्टीव जॉब्स जो गोल चश्मा पहनते थे, वह भी गांधी जी को सम्मान जताने का एक तरीका था।
9. सरोजिनी नायडू प्यार से कहती थीं ‘मिकी माउस’
गांधी जी का छोटा कद, थोड़े बड़े कान और बिना दांतों वाली मासूम मुस्कान देखकर, उनकी करीबी मित्र और महान स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू उन्हें प्यार से ‘मिकी माउस’ (Mickey Mouse) कहकर चिढ़ाती थीं। गांधी जी भी इस मजाक का कभी बुरा नहीं मानते थे।
10. जीवन में देखीं सिर्फ दो फिल्में, पर उनके नाम हैं 8 ऑस्कर!
गांधी जी सिनेमा के सख्त खिलाफ थे और इसे समय की बर्बादी मानते थे। उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल दो फिल्में देखीं—पहली हिंदी फिल्म ‘राम राज्य’ और दूसरी अंग्रेजी फिल्म ‘मिशन टू मॉस्को’। लेकिन विडंबना देखिए, 1982 में उन्हीं के जीवन पर बनी हॉलीवुड फिल्म ‘Gandhi’ ने दुनिया के सबसे बड़े सिनेमा अवॉर्ड्स में 8 ऑस्कर पुरस्कार जीते।
11. आजादी के जश्न से दूर, दंगों को शांत कर रहे थे बापू
15 अगस्त 1947 को जब पूरा देश आजादी के जश्न में डूबा था और दिल्ली में तिरंगा फहराया जा रहा था, तब गांधी जी वहां मौजूद नहीं थे। वे उस समय दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर कोलकाता के नोआखली में थे, जहां वे देश के विभाजन के बाद भड़के हिंदू-मुस्लिम दंगों को शांत करने के लिए उपवास पर बैठे थे।
निष्कर्ष (Conclusion)
महात्मा गांधी का जीवन हमें सिखाता है कि महान बनने के लिए किसी अलौकिक शक्ति की जरूरत नहीं होती। स्कूल और कॉलेज के दिनों में एक साधारण और औसत रहने वाला छात्र भी अपने सत्य, दृढ़ संकल्प, अच्छे राजनैतिक मार्गदर्शन और पवित्र विचारों के दम पर ‘महात्मा’ और पूरे देश का ‘राष्ट्रपिता’ बन सकता है।
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