हल्द्वानी के बनभूलपुरा में 78 एकड़ रेलवे जमीन पर 3500 मकान, मस्जिद-मदरसे को लेकर विवाद। जानें पूरा मामला, 2024 की हिंसा और आज की सुप्रीम कोर्ट सुनवाई की पूरी टाइमलाइन।
उत्तराखंड के हल्द्वानी स्थित बनभूलपुरा में रेलवे की करीब 78 एकड़ जमीन पर अतिक्रमण को लेकर आज सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हो रही है। इस जमीन पर 3500 से ज्यादा मकान, मस्जिद और मदरसे बने हुए हैं, जहां करीब 50 हजार लोग रहते हैं। सुनवाई से पहले पूरे इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है और भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
क्या है बनभूलपुरा नजूल जमीन विवाद
यह विवाद हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके की करीब 30 हेक्टेयर यानी लगभग 78 एकड़ जमीन को लेकर है। मुस्लिम बहुल इस इलाके में 3500 से ज्यादा मकानों के अलावा मस्जिद और मदरसे भी बने हुए हैं।
यह मामला मूल रूप से गौला नदी में अवैध खनन से जुड़ी एक जनहित याचिका से शुरू हुआ था, जिस पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने इलाके से अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए थे। हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद रेलवे ने इस जमीन पर अपना मालिकाना हक जताते हुए स्थानीय निवासियों को जगह खाली करने का नोटिस भेजा। इसके खिलाफ स्थानीय लोग सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां हजारों परिवारों के पुनर्वास, मालिकाना हक और जमीन को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई चल रही है।
रेलवे के दस्तावेज बनाम स्थानीय निवासियों का दावा
रेलवे का कहना है कि उसके पास 1959 का नोटिफिकेशन, 1971 का रेवेन्यू रिकॉर्ड और 2017 की सर्वे रिपोर्ट मौजूद है, जो साबित करती है कि पूरी 78 एकड़ जमीन रेलवे की ही है।
वहीं स्थानीय निवासियों का कहना है कि शुरुआत में हाईकोर्ट में सिर्फ 29 एकड़ जमीन का ही विवाद था, लेकिन बाद में रेलवे ने पूरे 78 एकड़ क्षेत्र पर दावा करना शुरू कर दिया। निवासियों की दलील है कि वे यहां 100 साल से ज्यादा समय से रह रहे हैं और यह जमीन राज्य सरकार की नजूल भूमि है। उनकी मांग है कि सरकार इसे फ्री-होल्ड कर उनकी रिहाइश को वैध ठहराए, न कि रेलवे की जमीन बताकर उन्हें बेघर किया जाए।
नजूल जमीन आखिर होती क्या है
नजूल जमीन असल में एक तरह की सरकारी जमीन होती है, जिस पर सरकार की अनुमति के बिना न तो पक्का निर्माण किया जा सकता है और न ही खेती। इसे आम लोग सीधे खरीद-बेच भी नहीं सकते।
अंग्रेजों के शासनकाल में जिन बागियों और स्वतंत्रता सेनानियों की जमीनें ब्रिटिश सरकार ने जब्त की थीं, वे आजादी के बाद उत्तराधिकारियों के न मिलने या सही कागजात न होने की वजह से भारत सरकार के पास आ गईं। राज्य सरकारें ऐसी जमीनों को 15 से 99 साल तक की लीज पर देती हैं, जिसे लीज खत्म होने पर रेवेन्यू विभाग से रिन्यू कराया जा सकता है। नजूल लैंड्स (ट्रांसफर) रूल्स 1956 के तहत इन जमीनों का इस्तेमाल आमतौर पर अस्पताल, स्कूल, पंचायत भवन या हाउसिंग सोसायटियों के लिए किया जाता है।
8 फरवरी 2024 की हिंसा
बनभूलपुरा का यह विवाद सिर्फ अदालती दायरे तक सीमित नहीं रहा। 8 फरवरी 2024 को जब प्रशासन और नगर निगम की टीम अवैध निर्माण और अतिक्रमण हटाने पहुंची थी, तब वहां पथराव, आगजनी और हिंसा हुई। इस दौरान पुलिस थाने सहित सरकारी और नगर निगम की संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा।
पुलिस के मुताबिक इस हिंसा में पेट्रोल बम और हथियारों का इस्तेमाल किया गया था। जांच के बाद पुलिस ने मुख्य आरोपियों के खिलाफ यूएपीए सहित कई गंभीर धाराओं में मामले दर्ज किए। नगर निगम ने हिंसा के एक मुख्य आरोपी को 2.45 करोड़ रुपये के नुकसान की भरपाई का रिकवरी नोटिस भी जारी किया था। यहां स्पष्ट करना जरूरी है कि ये आरोप अभी अदालत में विचाराधीन हैं और आरोपियों का दोष कोर्ट में साबित होना बाकी है।
हिंसा के बाद इलाके में तनाव बढ़ गया था और सुरक्षा के डर से 500 से ज्यादा मुस्लिम परिवारों ने अस्थायी रूप से पलायन करना शुरू कर दिया था। कई परिवार अपने घर का सामान लेकर पैदल ही सड़कों पर जाते देखे गए थे।
हिंसा से जुड़े मामलों में कानूनी कार्रवाई अब भी जारी है। मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने दो आरोपियों की डिफॉल्ट बेल रद्द करते हुए कहा था कि हाईकोर्ट ने तथ्यों को समझने में गलती की। वहीं जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य आरोपी की जमानत बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज कर दी थी।
24 फरवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट फैसला और पुनर्वास की व्यवस्था
इस साल 24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बड़ा फैसला सुनाया था। शीर्ष अदालत ने कहा था कि विवादित जमीन रेलवे की ही है और रेलवे इसका इस्तेमाल अपने हिसाब से करने के लिए पूरी तरह आजाद है। कोर्ट ने यह भी कहा था कि याचिकाकर्ता या स्थानीय निवासी उसी जगह पर बसे रहने का दावा नहीं कर सकते।
हालांकि कोर्ट ने प्रभावित परिवारों के लिए राहत का भी ऐलान किया था। अदालत ने निर्देश दिया था कि रेलवे और स्थानीय प्रशासन मिलकर पहले उन परिवारों की पहचान करें, जो निष्कासन की कार्रवाई से सीधे प्रभावित होंगे। इसके तहत पात्र विस्थापित परिवारों को छह महीने तक हर माह 2,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जानी है, ताकि वे अस्थायी तौर पर अपने रहने का इंतजाम कर सकें।
कोर्ट के आदेश के मुताबिक प्रभावित परिवारों के स्थायी पुनर्वास के लिए नैनीताल के राजस्व प्राधिकरण, जिला प्रशासन और रेलवे को मिलकर शिविर आयोजित करने और बनभूलपुरा में ही ‘पुनर्वास केंद्र’ बनाने के निर्देश दिए गए थे।
आज की सुनवाई से पहले हल्द्वानी में हाई अलर्ट
आज होने वाली सुनवाई को देखते हुए बनभूलपुरा इलाके में पुलिस-प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। एसपी क्राइम और एसपी सिटी के नेतृत्व में पुलिस की संयुक्त टीमों ने संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च किया है। पूरे इलाके पर ड्रोन और सीसीटीवी कैमरों के जरिए निगरानी रखी जा रही है।
सुरक्षा व्यवस्था में 2 पीएसी कंपनियां, दो ड्रोन टीमें, चार फायर यूनिट, एक बम निरोधक दस्ता (बीडीएस), दो टियर गैस टीमें, दो दंगा नियंत्रण टीमें और यातायात व्यवस्था के लिए चार ट्रैफिक टीमें तैनात की गई हैं। मामले से जुड़े याचिकाकर्ता और सपा नेता अब्दुल मतीन सिद्दीकी ने भी लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आए, सभी को उसका सम्मान करना चाहिए। इस खबर के प्रकाशन तक सुनवाई का नतीजा सामने नहीं आया था, इसलिए फैसले से जुड़ी जानकारी आधिकारिक आदेश आने के बाद अपडेट की जाएगी।
बनभूलपुरा मामला: पूरी टाइमलाइन
- 9 नवंबर 2016: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने गौला नदी अवैध खनन जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए रेलवे को दस सप्ताह के भीतर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए।
- 10 जनवरी 2017: अतिक्रमणकारियों और राज्य सरकार की ओर से जमीन को नजूल भूमि बताने वाला शपथ पत्र हाईकोर्ट ने खारिज किया, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में कई विशेष याचिकाएं दाखिल हुईं।
- दिसंबर 2022: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने बनभूलपुरा से करीब 50,000 लोगों को रेलवे जमीन से हटाने का आदेश दिया।
- जनवरी 2023: सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निष्कासन आदेश पर रोक लगाई, जिसे समय-समय पर आगे बढ़ाया जाता रहा।
- जुलाई–सितंबर 2024: सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार, केंद्र सरकार और रेलवे को प्रभावित परिवारों के लिए पुनर्वास योजना तैयार करने के निर्देश दिए।
- 8 फरवरी 2024: अतिक्रमण हटाने पहुंची प्रशासन-नगर निगम की टीम पर पथराव, आगजनी और हिंसा; पुलिस थाने सहित सरकारी संपत्ति को नुकसान; यूएपीए सहित कई मामले दर्ज।
- हिंसा के बाद: सुरक्षा के डर से 500 से ज्यादा मुस्लिम परिवारों का अस्थायी पलायन; नगर निगम की ओर से एक आरोपी को 2.45 करोड़ रुपये के रिकवरी नोटिस।
- 16 अप्रैल 2026: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने हिंसा के एक आरोपी को जमानत दी।
- 24 फरवरी 2026: सुप्रीम कोर्ट का फैसला — जमीन रेलवे की, कब्जाधारियों को दावे का अधिकार नहीं; विस्थापित परिवारों को 6 माह तक 2,000 रुपये मासिक सहायता और पुनर्वास केंद्र बनाने के निर्देश।
- 5 मई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने हिंसा के दो आरोपियों की डिफॉल्ट बेल रद्द की।
- 31 जुलाई 2026: सुप्रीम कोर्ट ने एक आरोपी की जमानत बरकरार रखते हुए राज्य सरकार की याचिका खारिज की।
- 9 सितंबर 2026: बनभूलपुरा नजूल जमीन मामले में सुप्रीम कोर्ट में आज अहम सुनवाई, भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच फैसले का इंतजार।
FAQ:
Q1. बनभूलपुरा नजूल जमीन विवाद क्या है? Answer: यह हल्द्वानी के बनभूलपुरा इलाके की करीब 78 एकड़ जमीन को लेकर विवाद है, जिस पर रेलवे अपना मालिकाना हक बताती है जबकि स्थानीय निवासी इसे राज्य सरकार की नजूल भूमि बता रहे हैं। इस जमीन पर 3500 से ज्यादा मकान, मस्जिद और मदरसे बने हैं।
Q2. सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2026 में क्या फैसला दिया था? Answer: 24 फरवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि विवादित जमीन रेलवे की ही है और कब्जाधारी उस पर बसे रहने का दावा नहीं कर सकते। साथ ही कोर्ट ने विस्थापित परिवारों को 6 महीने तक हर माह 2,000 रुपये आर्थिक सहायता और पुनर्वास केंद्र बनाने के निर्देश भी दिए थे।
Q3. नजूल जमीन किसे कहते हैं? Answer: नजूल जमीन ऐसी सरकारी जमीन होती है जिस पर सरकार की अनुमति के बिना पक्का निर्माण या खेती नहीं की जा सकती और जिसे आम लोग सीधे खरीद-बेच नहीं सकते। इसे आमतौर पर लीज पर दिया जाता है।
Q4. 8 फरवरी 2024 को बनभूलपुरा में क्या हुआ था? Answer: पुलिस के मुताबिक अतिक्रमण हटाने पहुंची प्रशासन और नगर निगम की टीम पर पथराव, आगजनी और हिंसा हुई थी, जिसमें पुलिस थाने सहित सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचा। इस मामले में यूएपीए सहित कई धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए, जिन पर अदालती कार्रवाई अभी जारी है।
Q5. आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई को लेकर सुरक्षा व्यवस्था कैसी है? Answer: बनभूलपुरा में भारी पुलिस बल, पीएसी कंपनियां, ड्रोन टीमें, फायर यूनिट, बम निरोधक दस्ता और दंगा नियंत्रण टीमें तैनात की गई हैं। संवेदनशील इलाकों में फ्लैग मार्च और ड्रोन-सीसीटीवी से निगरानी की जा रही है।
SOURCE/FACT-CHECK NOTE:
यह लेख 9 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में हुई/होने वाली सुनवाई से जुड़ी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध रिपोर्ट्स पर आधारित है। मुख्य तथ्य — जमीन का क्षेत्रफल, मकानों की संख्या, 24 फरवरी 2026 का सुप्रीम कोर्ट आदेश, पुनर्वास सहायता राशि, और 8 फरवरी 2024 की हिंसा से जुड़ी जानकारी — AajTak की रिपोर्ट पर आधारित है। हिंसा से जुड़े कानूनी घटनाक्रम (जमानत रद्द/बरकरार) के लिए Punjab Kesari, Deshbandhu, Panchjanya और अन्य रिपोर्ट्स का संदर्भ लिया गया है। आज की सुनवाई से पहले सुरक्षा व्यवस्था की जानकारी Amar Ujala और Haldwani Express News की रिपोर्ट्स से ली गई है। लेख के प्रकाशन के समय तक आज की सुनवाई का अंतिम नतीजा सार्वजनिक नहीं हुआ था, इसलिए इसे तथ्य के तौर पर शामिल नहीं किया गया है। हिंसा के मामलों में सभी आरोप अभी अदालत में विचाराधीन हैं और आरोपियों का दोष सिद्ध होना बाकी है, इसे ध्यान में रखते हुए लेख में आरोपों को पुलिस/जांच के हवाले से लिखा गया है।
