एक ऐतिहासिक फैसले में, एमपी हाईकोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित किया जो भारत भर में विवादित धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ ने धार जिले के विवादित भोजशाला-कमल मौला परिसर को आधिकारिक तौर पर देवी वाग्देवी (सरस्वती) का मंदिर घोषित कर दिया है।
न्यायाधीश विजय कुमार शुक्ला और न्यायाधीश आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा सौंपी गई वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के साक्ष्यों की गहन समीक्षा करने के बाद यह बड़ा फैसला सुनाया।
एमपी हाईकोर्ट के फैसले की मुख्य बातें
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने 11वीं सदी के इस स्मारक में दशकों से चली आ रही पूजा-नमाज़ की व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया है। फैसले के मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:
- धार्मिक चरित्र की पुष्टि: अदालत ने माना कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्यों और वास्तुकला के तथ्यों से यह पूरी तरह सिद्ध होता है कि यह स्थल एक प्राचीन संस्कृत शिक्षण केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर है।
- 2003 का ASI आदेश रद्द: कोर्ट ने 7 अप्रैल 2003 के एएसआई के उस परिपत्र (circular) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है, जिसके तहत हिंदुओं को केवल मंगलवार को पूजा करने और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज़ अदा करने की अनुमति थी। अब यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई है।
- मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि: मुस्लिम समुदाय के धार्मिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए, अदालत ने कहा कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी या कोई भी संबंधित वक्फ संस्था धार जिले के भीतर मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक भूमि के आवंटन हेतु राज्य सरकार को आवेदन दे सकती है।
- सरस्वती प्रतिमा की वापसी: हाईकोर्ट ने भारत सरकार को निर्देश दिया है कि वह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में रखी देवी सरस्वती की मूल वाग्देवी प्रतिमा को वापस लाने और इसे पुनः परिसर में स्थापित करने के लिए आवश्यक कानूनी व राजनयिक कदम उठाए।
एएसआई (ASI) सर्वेक्षण रिपोर्ट की भूमिका
यह फैसला पूरी तरह से एएसआई द्वारा किए गए 98 दिनों के व्यापक वैज्ञानिक सर्वेक्षण पर आधारित है। हाईकोर्ट ने ही स्मारक की वास्तविक प्रकृति का पता लगाने के लिए इस सर्वेक्षण का आदेश दिया था।
ASI की रिपोर्ट के अनुसार, संरचनात्मक जांच से पता चला कि मौजूदा स्मारक का निर्माण पहले से मौजूद हिंदू मंदिरों के वास्तुशिल्प अवशेषों का उपयोग करके किया गया था। रिपोर्ट में नक्काशीदार खंभों, भित्तिचित्रों और हिंदू देवी-देवताओं की खंडित मूर्तियों की मौजूदगी का जिक्र किया गया था, जिससे यह निष्कर्ष निकला कि यह मूल रूप से परमार राजवंश के राजा भोज के शासनकाल में निर्मित एक मंदिर परिसर था।
हाईकोर्ट की पीठ ने कहा कि उसने इन वैज्ञानिक निष्कर्षों पर भरोसा किया है, जो कि अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित किए गए कानूनी मिसालों के अनुरूप हैं।
आगे क्या होगा? प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था
भले ही भोजशाला परिसर को कानूनी रूप से मंदिर मान लिया गया है, लेकिन इसकी देखरेख का जिम्मा पहले की तरह ही रहेगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इस संरक्षित ऐतिहासिक स्मारक के समग्र प्रशासन, प्रबंधन और रखरखाव का काम संभालता रहेगा।
इसके अलावा, केंद्र सरकार और एएसआई को निर्देश दिया गया है कि वे परिसर में मंदिर के अनुष्ठानों और संस्कृत शिक्षण गतिविधियों को फिर से शुरू करने के संबंध में एक निश्चित योजना तैयार करें।
फैसले की संवेदनशीलता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा धार जिले और आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था बेहद सख्त कर दी गई है, ताकि शांति व्यवस्था बनी रहे और सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की अफवाह न फैले।
