जानें शुभेंदु अधिकारी की राजनीतिक यात्रा, नंदीग्राम आंदोलन में उनकी भूमिका और ममता बनर्जी का साथ छोड़कर भाजपा में शामिल होने के पीछे के असली कारण।
पश्चिम बंगाल की हाई-प्रोफाइल राजनीति के रंगमंच पर शुभेंदु अधिकारी जैसा प्रभाव रखने वाले नाम बहुत कम हैं। कभी ममता बनर्जी के “चहेते” और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के मजबूत स्तंभ रहे शुभेंदु का 2020 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होना एक ऐसी बड़ी घटना थी, जिसने राज्य के सत्ता समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया।
लेकिन शुभेंदु अधिकारी कौन हैं, और उन्होंने उस महिला का साथ क्यों छोड़ा जिसे सत्ता में लाने में उन्होंने खुद मदद की थी? आइए विस्तार से जानते हैं।
1. राजनीतिक विरासत और शुरुआती दौर
शुभेंदु अधिकारी ने राजनीति में केवल प्रवेश नहीं किया; उनका जन्म ही राजनीति में हुआ था। उनका परिवार पूर्व मेदिनीपुर जिले का एक शक्तिशाली राजनीतिक घराना है।
- पिता का साया: उनके पिता शिशिर अधिकारी एक अनुभवी राजनेता, पूर्व केंद्रीय मंत्री और कई बार सांसद रह चुके हैं।
- शुरुआती सफर: शुभेंदु ने 90 के दशक के मध्य में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ अपनी यात्रा शुरू की और 1995 में कांथी नगर पालिका में पार्षद के रूप में अपना पहला चुनाव जीता।
- TMC में आगमन: 1998 में जब ममता बनर्जी ने TMC बनाई, तो अधिकारी परिवार उनके शुरुआती सहयोगियों में से एक था, जिससे पार्टी को मेदिनीपुर में एक विशाल जमीनी आधार मिला।
2. नंदीग्राम के नायक (2007)
यदि ममता बनर्जी TMC का चेहरा थीं, तो शुभेंदु अधिकारी उनके सबसे कुशल “फील्ड जनरल” थे।
- ऐतिहासिक आंदोलन: 2007 में, जब तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार ने SEZ के लिए नंदीग्राम में 10,000 एकड़ भूमि अधिग्रहित करने की योजना बनाई, तब शुभेंदु ने ‘भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी’ का नेतृत्व किया।
- परिणाम: इस आंदोलन ने 34 साल पुराने वामपंथ के किले को ढहा दिया। 2011 में जब ममता बनर्जी सत्ता में आईं, तो शुभेंदु एक कद्दावर “जननेता” के रूप में स्थापित हो चुके थे।
3. ममता बनर्जी और शुभेंदु के बीच दरार क्यों आई?
सालों तक शुभेंदु परिवहन मंत्री और प्रमुख रणनीतिकार रहे, लेकिन 2020 के अंत तक “दीदी-शुभेंदु” का बंधन टूट गया। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित थे:
- अभिषेक बनर्जी का बढ़ता कद: पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी को दी जा रही शक्तियों से शुभेंदु उपेक्षित महसूस करने लगे थे। उन्होंने स्पष्ट किया था कि वह “वंशवाद” के नीचे काम नहीं करेंगे।
- स्वायत्तता की कमी: 2019 के बाद चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर के आने से शुभेंदु को लगा कि संगठन पर उनकी पकड़ को जानबूझकर कम किया जा रहा है।
- राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा: दिसंबर 2020 में, अमित शाह की उपस्थिति में वह भाजपा में शामिल हुए और नारा दिया: “तोलाबाज भाईपो हटाओ” (वसूली करने वाले भतीजे को हटाओ)।
4. ‘जाइंट किलर’: 2021 का ऐतिहासिक चुनाव
शुभेंदु अधिकारी के करियर का सबसे नाटकीय मोड़ 2021 के विधानसभा चुनावों में आया।
चुनौती और जीत: शुभेंदु ने अपनी पूर्व गुरु ममता बनर्जी को उनके ही क्षेत्र (नंदीग्राम) में चुनाव लड़ने की चुनौती दी। एक बेहद कड़े मुकाबले में, उन्होंने ममता बनर्जी को 1,956 वोटों से हराकर राजनीति में “जाइंट किलर” का खिताब हासिल किया।
आज वह पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष (Leader of Opposition) की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
5. वर्तमान राजनीतिक स्थिति और लक्ष्य
आज शुभेंदु अधिकारी बंगाल में भाजपा का मुख्य चेहरा हैं। उनका राजनीतिक एजेंडा अब इन तीन बिंदुओं पर केंद्रित है:
- भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग: शारदा और रोज वैली जैसे घोटालों पर सरकार को घेरना।
- वंशवाद का विरोध: TMC के भीतर “पारिवारिक सत्ता” को चुनौती देना।
- हिंदू मतदाताओं की एकजुटता: बंगाल में सांस्कृतिक और राष्ट्रवादी मुद्दों को प्रमुखता देना।
निष्कर्ष
शुभेंदु अधिकारी की यात्रा एक गुरु से आगे निकल जाने वाले शिष्य की क्लासिक कहानी है। चाहे आप उन्हें एक “रणनीतिकार” के रूप में देखें या एक “विद्रोही” के रूप में, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह आज बंगाल के सबसे प्रभावशाली स्थानीय नेताओं में से एक हैं।
