डकैती एक्ट: चंबल में सक्रिय डकैत गिरोह नहीं होने के बावजूद 1000+ FIR का दावा। गोविंद सिंह की याचिका पर हाईकोर्ट ने DGP समेत अफसरों से 4 हफ्ते में जवाब मांगा।
ग्वालियर-चंबल अंचल में लागू 45 साल पुराने डकैती कानून पर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब मांगा है। कोर्ट ने पुलिस महानिदेशक (DGP), गृह विभाग के प्रमुख सचिव और अंचल के जिलों के पुलिस अधीक्षकों (SP) को नोटिस जारी कर पूछा है कि जब प्रदेश में कोई सूचीबद्ध डकैत गिरोह सक्रिय ही नहीं है, तो यह सख्त कानून अब भी क्यों लागू है।
यह मामला मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष और लहार से पूर्व विधायक डॉ. गोविंद सिंह की एक जनहित याचिका से जुड़ा है। हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में इस पर सुनवाई हुई, जिसमें अदालत ने मामले को गंभीरता से लेते हुए संबंधित अधिकारियों से चार हफ्ते के भीतर जवाब मांगा है।
क्या है पूरा मामला
डॉ. गोविंद सिंह ने मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम 1981 को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। यह कानून करीब 45 साल पहले, 6 अक्टूबर 1981 को, चंबल के बीहड़ों में सक्रिय डकैत गिरोहों से निपटने के लिए बनाया गया था। उस दौर में चंबल क्षेत्र में डकैतों का खासा दबदबा हुआ करता था और इसी वजह से इस अधिनियम के तहत विशेष न्यायालय गठित किया गया था।
याचिका में कहा गया है कि अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं, लेकिन कानून अब भी उसी सख्ती के साथ लागू है।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील: सरकार खुद कह चुकी है कि कोई डकैत नहीं बचा
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता राजीव शर्मा ने अदालत में दलील दी कि राज्य सरकार स्वयं विधानसभा के पटल पर यह स्वीकार कर चुकी है कि साल 2007 के बाद प्रदेश में कोई नया सूचीबद्ध डकैत नहीं बना है और वर्तमान में कोई गिरोह सक्रिय नहीं है।
याचिका के अनुसार कोई भी कानून समय की जरूरत के हिसाब से बनाया जाता है, और जब उसका उद्देश्य पूरा हो जाए तो उसे निरस्त कर देना चाहिए। चूंकि चंबल क्षेत्र की मौजूदा स्थिति 1981 वाली नहीं रही, इसलिए इस अधिनियम को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं बचा।
आम लोगों पर सख्त धाराओं के दुरुपयोग का आरोप
याचिका में सबसे गंभीर आरोप यह लगाया गया है कि चंबल अंचल की स्थानीय पुलिस इस कानून का दुरुपयोग कर रही है। गांव-देहात में होने वाले मामूली झगड़ों, जमीनी विवादों और आपसी रंजिश के सामान्य आपराधिक मामलों में भी सीधे डकैती अधिनियम की सख्त धारा 11 और 13 जोड़ दी जाती है।
इसके अलावा पुलिस इस अधिनियम की धारा 5(1) का सहारा लेती है, जिसके तहत आरोपी को अग्रिम जमानत मिलने पर वैधानिक प्रतिबंध रहता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि इसी प्रावधान का फायदा उठाकर निर्दोष लोगों को लंबे समय तक जेल में रहने पर मजबूर किया जाता है।
आंकड़े क्या कहते हैं: पांच साल में 1000 से ज्यादा FIR
याचिका में पेश आंकड़ों के मुताबिक, चंबल-ग्वालियर अंचल के शिवपुरी, ग्वालियर, भिंड, मुरैना, श्योपुर और दतिया जिलों में पिछले पांच वर्षों यानी 2020 से अब तक इस अधिनियम के तहत 1,000 से ज्यादा प्राथमिकियां (FIR) दर्ज की गई हैं।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि बिना किसी सक्रिय डकैत गिरोह की मौजूदगी के आम नागरिकों पर इतना सख्त कानून लागू करना नागरिकों के मौलिक अधिकारों का सीधा हनन है। इसी आधार पर याचिका में इस 45 साल पुराने अधिनियम को पूरी तरह निरस्त करने की मांग की गई है।
हाईकोर्ट का आदेश: किन-किन अधिकारियों को नोटिस
हाईकोर्ट की युगलपीठ ने याचिका में उठाए गए बिंदुओं को विचारणीय मानते हुए राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन से जवाबदेही तय की है। न्यूज एजेंसी रिपोर्टों के मुताबिक जारी किए गए नोटिस के दायरे को लेकर अलग-अलग विवरण सामने आए हैं।
राष्ट्र चंडिका की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने मध्य प्रदेश गृह विभाग के प्रमुख सचिव, पुलिस महानिदेशक (DGP) और ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया, शिवपुरी व श्योपुर—इन 6 जिलों के पुलिस अधीक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किया है। वहीं लल्लूराम डॉट कॉम की रिपोर्ट में बताया गया है कि नोटिस प्रमुख सचिव (गृह), प्रमुख सचिव (विधि), ग्वालियर-चंबल अंचल के आईजी व डीआईजी और अंचल के 7 जिलों के पुलिस अधीक्षकों समेत कुल 11 वरिष्ठ अधिकारियों को भेजा गया है।
दोनों रिपोर्टों में जिलों के नाम—ग्वालियर, भिंड, मुरैना, शिवपुरी, श्योपुर और दतिया—एक जैसे हैं, लेकिन नोटिस पाने वाले अधिकारियों की कुल संख्या और सातवें जिले को लेकर स्पष्टता का अभाव है। सभी अधिकारियों को नोटिस की तामील के साथ चार सप्ताह के भीतर शपथ-पत्र के जरिए जवाब देने का निर्देश दिया गया है।
कानून का इतिहास: क्यों बना था यह सख्त अधिनियम
मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम की नींव उस दौर में पड़ी थी जब चंबल के बीहड़ों में डकैत गिरोहों की तूती बोलती थी। 6 अक्टूबर 1981 को इसके तहत विशेष न्यायालय का गठन किया गया था। अधिनियम में डकैती, अपहरण, लूट के साथ-साथ डकैतों को संरक्षण या मदद देने वालों पर भी सख्त कार्रवाई का प्रावधान रखा गया था।
अब जब बीहड़ों से डकैत गिरोह लगभग समाप्त हो चुके हैं, याचिकाकर्ता का सवाल है कि क्या इतना पुराना और सख्त कानून मौजूदा संवैधानिक व्यवस्था के अनुरूप है।
आगे क्या होगा
फिलहाल मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ में लंबित है। नोटिस पाने वाले सभी अधिकारियों को चार हफ्ते के भीतर इस अधिनियम के मौजूदा इस्तेमाल और औचित्य पर अपना जवाब अदालत में पेश करना है। अगली सुनवाई में यह तय होगा कि दशकों पुराना यह कानून बरकरार रहेगा या इसे निरस्त करने की दिशा में आगे कदम बढ़ाया जाएगा।
FAQ:
Q1. मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम कब बना था?
Answer: यह अधिनियम करीब 45 साल पहले बना था और इसके तहत 6 अक्टूबर 1981 को विशेष न्यायालय गठित किया गया था।
Q2. इस याचिका में किसने और क्या मांग की है?
Answer: मध्य प्रदेश विधानसभा के पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस 45 साल पुराने अधिनियम को निरस्त करने की मांग की है, क्योंकि अब चंबल में कोई सक्रिय डकैत गिरोह नहीं है।
Q3. पुलिस पर इस कानून के दुरुपयोग का क्या आरोप है?
Answer: याचिका में आरोप है कि पुलिस मामूली झगड़ों और जमीनी विवादों में भी इस अधिनियम की धारा 11 और 13 जोड़ देती है, जिससे आरोपियों को धारा 5(1) के तहत अग्रिम जमानत नहीं मिल पाती।
Q4. पिछले पांच साल में इस अधिनियम के तहत कितनी FIR दर्ज हुई हैं?
Answer: याचिका में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2020 से अब तक चंबल-ग्वालियर अंचल के छह जिलों में इस अधिनियम के तहत 1,000 से ज्यादा FIR दर्ज की गई हैं।
Q5. हाईकोर्ट ने किन अधिकारियों को नोटिस जारी किया है?
Answer: रिपोर्टों के अनुसार डीजीपी, गृह विभाग के प्रमुख सचिव और चंबल-ग्वालियर अंचल के जिलों के पुलिस अधीक्षकों को नोटिस भेजा गया है, हालांकि नोटिस पाने वाले अधिकारियों की सटीक संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अंतर है।
SOURCE/FACT CHECK NOTE: यह लेख निम्न स्रोतों पर आधारित है:
- Rashtra Chandika (9 सितंबर 2026) — DGP, गृह सचिव और 6 SP को नोटिस, 1,000+ FIR का आंकड़ा, 4 सप्ताह की समय-सीमा।
- Lalluram.com (9 सितंबर 2026) — प्रमुख सचिव (गृह व विधि), आईजी-डीआईजी और 7 जिलों के SP समेत 11 अधिकारियों को नोटिस।
- Vistaar News (सितंबर 2026) — अधिनियम की पृष्ठभूमि, 6 अक्टूबर 1981 को विशेष न्यायालय गठन की जानकारी। नोट: नोटिस पाने वाले अधिकारियों की कुल संख्या (6 SP बनाम 7 SP समेत 11 अधिकारी) को लेकर स्रोतों में अंतर है, जिसे लेख में स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है। अगली सुनवाई की तारीख और अधिकारियों के जवाब का विवरण अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है — इसे अपडेट होने पर जोड़ा जाना चाहिए।
