Narwar Fort History: जानिए मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक नरवर किले (Narwar Kila) का इतिहास, यहाँ राज करने वाले राजाओं की कहानी और किले से गायब हुई करोड़ों की अष्टधातु तोप का पूरा सच।
क्या आप जानते हैं कि भारत में एक ऐसा भी किला है जिसके वैभव की कहानियां महाभारत काल से जुड़ी हैं? एक ऐसा किला जहां कभी राजा नल और दमयंती की अमर प्रेम कहानी गढ़ी गई थी। हम बात कर रहे हैं मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित नरवर किले (Narwar Fort) की।
हाल ही में यह किला तब सुर्खियों में आया जब यहाँ से सदियों पुरानी एक ऐतिहासिक अष्टधातु की तोप रहस्यमय तरीके से गायब हो गई। आइए जानते हैं इस ऐतिहासिक किले का गौरवशाली इतिहास, इस पर राज करने वाले राजा और उस गायब हुई तोप का पूरा सच!
नरवर किले का इतिहास: किसने बनवाया था यह किला?
नरवर किले का इतिहास बेहद प्राचीन और गौरवशाली है।
- महाभारत काल से संबंध: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस किले का संबंध महाभारत काल के राजा नल से है। इसे राजा नल की राजधानी ‘नैषध नगर’ के रूप में जाना जाता था। राजा नल और रानी दमयंती की प्रेम कथा आज भी यहाँ की हवाओं में गूंजती है।
- पुनर्निर्माण और विस्तार: हालांकि, आधुनिक इतिहासकारों के अनुसार इस किले के मजबूत पत्थरों के परकोटे और मुख्य ऊंचे ढांचे का निर्माण 9वीं से 10वीं शताब्दी में कछवाहा राजपूत राजाओं द्वारा करवाया गया था। इसके बाद समय-समय पर यहाँ राज करने वाले राजवंशों ने इसका विस्तार किया।
किन-किन राजाओं ने किया नरवर पर राज?
नरवर का किला रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण था, इसलिए इस पर अधिकार करने के लिए कई बड़े राजवंशों के बीच संघर्ष हुआ:
- कछवाहा राजवंश: किले के प्रारंभिक निर्माता और शासक।
- परिहार और तोमर राजपूत: कछवाहों के बाद इस किले पर प्रतिहारों (परिहार) और ग्वालियर के तोमर राजाओं का नियंत्रण रहा।
- दिल्ली सल्तनत और मुगल: सिकंदर लोदी से लेकर मुगलों (अकबर के शासनकाल) तक, इस किले पर दिल्ली सल्तनत का कब्जा रहा। मुगलों के समय यह एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक केंद्र (सरकार) था।
- सिंधिया राजवंश (मराठा): 19वीं सदी की शुरुआत में यह किला ग्वालियर के सिंधिया राजाओं के अधीन आ गया, जिन्होंने देश की आजादी तक इस क्षेत्र पर शासन किया।
भारतीय इतिहास में नरवर किले का रोल (Importance)
भारतीय इतिहास में नरवर किले का स्थान बेहद महत्वपूर्ण रहा है:
- व्यापारिक मार्ग का केंद्र: यह किला प्राचीन काल में उत्तर भारत को दक्षिण भारत और मालवा से जोड़ने वाले मुख्य व्यापारिक और सैन्य मार्ग पर स्थित था। जो भी राजा मध्य भारत पर राज करना चाहता था, उसके लिए नरवर को जीतना जरूरी था।
- अभेद्य सुरक्षा: यह किला विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की एक ऊंची पहाड़ी पर बना है, जिसके तीन तरफ सिंध नदी बहती है। इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण दुश्मन के लिए इस पर कब्जा करना लगभग नामुमकिन था।
- सांस्कृतिक धरोहर: यह किला राजपूत, मुगल और मराठा वास्तुकला का एक अद्भुत मिश्रण है। यहाँ के महल, बावड़ियाँ और मंदिर भारतीय शिल्पकारी का बेजोड़ नमूना हैं।
गायब हुई ऐतिहासिक अष्टधातु तोप का इतिहास: किसने बनवाई थी यह तोप?
अब बात करते हैं उस रहस्यमयी तोप की, जो हाल ही में इस किले से गायब (चोरी) हो गई थी।
- किसने बनवाई थी यह तोप?: इतिहासकारों के अनुसार, किले के तोपखाने में रखी यह तोप मुगल काल और सिंधिया काल के बीच की मानी जाती है। मध्य भारत में अपनी पैठ मजबूत करने के लिए ग्वालियर के सिंधिया शासकों और तत्कालीन स्थानीय सूबेदारों ने किले की सुरक्षा के लिए भारी तोपों का निर्माण करवाया था।
- अष्टधातु का अनूठा मिश्रण: यह तोप साधारण लोहे की नहीं थी। इसे अष्टधातु (आठ बेशकीमती धातुओं के मिश्रण) से बनाया गया था, ताकि इसमें कभी जंग न लगे और यह बेहद मजबूत रहे। यही कारण है कि अंतरराष्ट्रीय ब्लैक मार्केट में इसकी कीमत करोड़ों में आंकी गई।
- चोरी की हैरान करने वाली वारदात: यह तोप इतनी भारी (कई क्विंटल वजनी) थी कि इसे इंसान अकेले हिला भी नहीं सकते थे। चोरों ने पूरी प्लानिंग के साथ सुरक्षा में सेंध लगाई और भारी-भरकम मशीनों (क्रेन या जेसीबी) के जरिए इस ऐतिहासिक धरोहर को किले से नीचे उतारा और गायब कर दिया। इस घटना ने पुरातत्व विभाग (ASI) और स्थानीय प्रशासन की सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलकर रख दी थी।
निष्कर्ष: धरोहरों को बचाने की जरूरत
नरवर किले से तोप का गायब होना सिर्फ एक चोरी नहीं, बल्कि भारत के इतिहास के एक पन्ने को मिटाने की कोशिश थी। हालांकि, पुलिस प्रशासन और पुरातत्व विभाग ने बाद में इस मामले में कड़ी कार्रवाई की, लेकिन इस घटना ने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि हम अपनी ऐतिहासिक विरासतों को लेकर कितने लापरवाह हैं।
अगर आप इतिहास प्रेमी हैं, तो राजा नल-दमयंती की इस नगरी और नरवर के किले को देखने एक बार जरूर जाएं!
